प्रख्यात इस्लामी विद्वान मौलाना सलमान हुसैनी नदवी का 72 वर्ष की आयु में लखनऊ में निधन हो गया। वे उन चुनिंदा मुस्लिम धर्मगुरुओं में शामिल थे जिन्होंने अयोध्या विवाद के समाधान के लिए अदालत के बजाय आपसी संवाद और सहमति का समर्थन किया था। सांप्रदायिक सौहार्द और विभिन्न धर्मों के बीच संवाद को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के कारण उन्हें देशभर में विशेष पहचान मिली।
मौलाना सलमान हुसैनी नदवी ने वर्ष 2018 में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के साथ कई दौर की बातचीत की थी। इस पहल का उद्देश्य राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का अदालत से बाहर सौहार्दपूर्ण समाधान तलाशना था। उस समय उन्होंने कहा था कि यदि शांति और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए आवश्यक हो, तो इस्लाम कुछ परिस्थितियों में मस्जिद को दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने की अनुमति देता है। उन्होंने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण और किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर मस्जिद बनाने का सुझाव दिया था।
उनके इस प्रस्ताव ने पूरे देश में व्यापक बहस छेड़ दी थी। जहां कई लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया, वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ सदस्यों ने इसका कड़ा विरोध किया। बोर्ड ने स्पष्ट किया था कि यह मौलाना नदवी की व्यक्तिगत राय है, संगठन का आधिकारिक रुख नहीं। बाद में मतभेदों के चलते उन्होंने बोर्ड से अलग होने का फैसला किया।
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मौलाना सलमान हुसैनी नदवी प्रतिष्ठित नदवा परिवार से संबंध रखते थे और दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ से जुड़े हुए थे। वे इस्लामी धर्मशास्त्र, अंतरधार्मिक संवाद और समकालीन सामाजिक मुद्दों पर अपने व्याख्यानों तथा लेखन के लिए भी जाने जाते थे। वे हमेशा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, सामाजिक सौहार्द और विभिन्न समुदायों के बीच सकारात्मक संवाद की वकालत करते रहे।
हालांकि उनकी मध्यस्थता से अयोध्या विवाद का समाधान नहीं हो सका, लेकिन उन्होंने संवाद आधारित समाधान की एक वैकल्पिक राह प्रस्तुत की। अंततः नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ और मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का निर्देश दिया गया।
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