केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 यानी एफसीआरए विधेयक को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज सकती है। सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला विपक्ष की ओर से विधेयक के प्रावधानों को लेकर उठाई गई चिंताओं के बीच लिया जा सकता है।
विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 को अभी तक लोकसभा की कार्यसूची में चर्चा और पारित करने के लिए शामिल नहीं किया गया है। हालांकि, सरकार पहले संकेत दे चुकी है कि इसे 12 अगस्त को सदन में चर्चा के लिए लाया जा सकता है।
इससे पहले 7 अगस्त को मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद कहा था कि एफसीआरए विधेयक पर 12 अगस्त को संसद में चर्चा और पारित करने की प्रक्रिया हो सकती है। उन्होंने यह भी बताया था कि विधेयक को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाएगा।
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लालदुहोमा चर्च नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ अमित शाह से मिले थे। प्रतिनिधिमंडल ने प्रस्तावित कानून को लेकर अपनी चिंताएं गृह मंत्री के सामने रखीं। विधेयक का उद्देश्य विदेशी फंड हासिल करने वाले संगठनों की निगरानी को और मजबूत करना है। इसके तहत एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने की स्थिति में गैर-सरकारी संगठनों की विदेशी अंशदान से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण के लिए एक शक्तिशाली ‘नामित प्राधिकरण’ बनाने का प्रस्ताव है।
प्रस्तावित कानून के अनुसार, यदि किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, संगठन स्वयं पंजीकरण वापस लेता है या समय पर नवीनीकरण नहीं होने के कारण पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो नामित प्राधिकरण विदेशी अंशदान और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल सकेगा।
विधेयक में यह भी प्रावधान है कि यदि संबंधित संपत्ति पूजा स्थल है, तो उसका धार्मिक स्वरूप बरकरार रखा जाएगा। वहीं, कानून के उल्लंघन पर अधिकतम सजा को पांच वर्ष की कैद से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव है।
एफसीआरए पोर्टल के अनुसार, 15 जुलाई 2026 तक देश में 14,449 एफसीआरए प्रमाणपत्र सक्रिय थे। वहीं 22,498 प्रमाणपत्र रद्द किए जा चुके थे और 15,212 प्रमाणपत्र समाप्त माने गए थे।
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