NEET-PG की कट-ऑफ को घटाकर माइनस 40 अंक तक लाने के फैसले ने हाल के दिनों में ज़बरदस्त बहस छेड़ दी है। मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। हालांकि, पिछले वर्षों में भी खाली सीटों को भरने के लिए ऐसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन इस बार विवाद कहीं ज़्यादा गहरा और भावनात्मक हो गया है।
आलोचकों का कहना है कि बड़ी संख्या में खाली सीटें निजी मेडिकल कॉलेजों में हैं और कट-ऑफ में इतनी भारी कटौती से ऐसे छात्रों को स्नातकोत्तर (पीजी) पाठ्यक्रमों में प्रवेश मिल सकता है, जिनकी बुनियादी समझ पर्याप्त नहीं है। यह आशंका सीधे तौर पर चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य में मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी मानी जा रही है।
सैद्धांतिक रूप से, शून्य पर्सेंटाइल का अर्थ यह होगा कि परीक्षा में बैठने वाला हर छात्र योग्य माना जाए। लेकिन जो बात सबसे अधिक चौंकाने वाली है, वह यह कि शून्य पर्सेंटाइल का स्कोर माइनस 40 अंकों के बराबर बताया जा रहा है। इससे न केवल चयन प्रक्रिया, बल्कि पूरी मूल्यांकन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
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टीवी बहसों और सोशल मीडिया पर “क्या अब माइनस 40 अंक लाने वाले डॉक्टर ऑपरेशन करेंगे?” जैसे नारेबाज़ी वाले तर्कों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे को केवल अंकों के गुस्से तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह बहस इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि हम चिकित्सा शिक्षा में किन मूल्यों को महत्व देते हैं, योग्यता का आकलन कैसे करते हैं और क्या मौजूदा प्रणाली वास्तव में छात्रों, मरीजों और पूरे चिकित्सा पेशे के हित में है।
वर्तमान विवाद को संख्या और कट-ऑफ की सनसनी से आगे बढ़कर चिकित्सा शिक्षा सुधार की व्यापक और गंभीर चर्चा का आधार बनना चाहिए।
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