युद्ध के दौरान किसी देश द्वारा दूसरे देश के परमाणु ठिकानों पर हमला करना पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। पहले जहां ऐसे संवेदनशील ठिकानों को युद्ध से अलग माना जाता था, अब वे भी संघर्षों की चपेट में आते दिख रहे हैं।
यूक्रेन के ज़ापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र से लेकर ईरान के नतांज़, फ़ोर्डो और इस्फ़हान जैसे परमाणु ठिकानों तक, हाल के वर्षों में इन पर हमलों या नुकसान के खतरे ने वैश्विक सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ईरान के बुशहर परमाणु संयंत्र और संयुक्त अरब अमीरात के बराक रिएक्टरों पर हमलों की घटनाओं ने यह सवाल और गंभीर कर दिया है कि क्या नागरिक ऊर्जा से जुड़े परमाणु ढांचे वास्तव में सुरक्षित हैं।
इतिहास में भी ऐसे हमलों के उदाहरण मिलते हैं। इज़राइल ने पहले इराक और सीरिया में परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था। हाल के समय में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के कई परमाणु-संबंधित ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिनमें बंकर-बस्टर बमों का उपयोग बताया गया। इन घटनाओं ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को नई चुनौती दी है, क्योंकि ऐसे ठिकानों को नुकसान होने पर रेडिएशन फैलने का खतरा होता है, जो सीमाओं से परे जाकर व्यापक तबाही का कारण बन सकता है।
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इस वैश्विक परिदृश्य में भारत और पाकिस्तान का मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दोनों देश परमाणु हथियार संपन्न हैं और लंबे समय से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। कई युद्धों और लगातार तनाव के बावजूद, दोनों देशों के बीच एक अनोखा संयम देखने को मिलता है। हाल ही में 2025 में “ऑपरेशन सिंदूर” के नाम से चार दिन की सैन्य झड़प भी हुई, लेकिन परमाणु ठिकानों को कभी निशाना नहीं बनाया गया।
गंभीर तनाव और राजनीतिक टकराव के बावजूद भारत और पाकिस्तान ने अब तक यह अनलिखा नियम बनाए रखा है कि वे एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे, जो वैश्विक रणनीतिक स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
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