हर वर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस भारत में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाता है। 1993 में लागू 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला और तब से यह व्यवस्था ग्रामीण शासन, समावेशन और विकास की धुरी बन गई है।
आज देश में 2.5 लाख से अधिक पंचायतें और लगभग 24.04 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, जिनमें करीब 49.75 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। यह आंकड़ा स्थानीय स्तर पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और सशक्तिकरण का प्रमाण है।
पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए सरकार ने प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दिया है। राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) के तहत 2025-26 में 45 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया, जिनमें निर्वाचित प्रतिनिधि और पंचायत कर्मी शामिल थे। इसके अलावा, 33,000 से अधिक अध्ययन दौरे, 632 पंचायत लर्निंग सेंटर और 1,087 ग्राम पंचायत भवनों का निर्माण किया गया है।
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महिलाओं की भूमिका को और मजबूत करने के लिए “मॉडल महिला अनुकूल ग्राम पंचायत” पहल चलाई जा रही है, जिसमें प्रत्येक जिले में एक पंचायत को लैंगिक संवेदनशील और समावेशी शासन का मॉडल बनाया जा रहा है। वहीं “सशक्त पंचायत–नेत्री अभियान” के तहत लगभग 1.49 लाख महिला प्रतिनिधियों को नेतृत्व और निर्णय लेने के कौशल में प्रशिक्षित किया गया है।
युवाओं को भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने के लिए “मॉडल यूथ ग्राम सभा” पहल शुरू की गई है। इसके तहत जवाहर नवोदय विद्यालय और एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल के छात्रों को ग्राम सभा की कार्यवाही से परिचित कराया जा रहा है।
आदिवासी क्षेत्रों में पेसा अधिनियम के जरिए स्वशासन को बढ़ावा मिला है। यह 10 राज्यों के हजारों गांवों और पंचायतों में लागू है और समुदाय आधारित शासन को मजबूत कर रहा है। इसके तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम और सर्वोत्तम प्रथाओं का दस्तावेजीकरण भी किया जा रहा है।
वित्तीय विकेंद्रीकरण ने भी पंचायतों को सशक्त बनाया है। 15वें वित्त आयोग ने ग्रामीण निकायों के लिए 2.36 लाख करोड़ रुपये की सिफारिश की, जबकि 16वें वित्त आयोग के तहत यह राशि बढ़कर लगभग 4.35 लाख करोड़ रुपये हो गई है।
इन प्रयासों के साथ, पंचायतें अब जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं के साथ मिलकर ग्रामीण विकास को नई दिशा दे रही हैं।
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