प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के अपने ताज़ा एपिसोड में एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या — एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) — पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ रही है, जिसके कारण निमोनिया और यूटीआई (मूत्र संक्रमण) जैसी आम बीमारियों में भी एंटीबायोटिक्स असरहीन साबित हो रही हैं। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि इसका सबसे बड़ा कारण एंटीबायोटिक्स का बिना डॉक्टर की सलाह के और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है।
उन्होंने कहा, “एंटीबायोटिक्स कोई ऐसी दवा नहीं है जिसे बिना सोचे-समझे लिया जाए। इनका इस्तेमाल केवल डॉक्टर की सलाह पर ही होना चाहिए।”
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस वह स्थिति है, जब बैक्टीरिया, वायरस या फंगस दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। इससे संक्रमण ज्यादा गंभीर, लंबे समय तक चलने वाले और इलाज में कठिन हो जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जरूरत से ज्यादा और गलत तरीके से एंटीबायोटिक्स लेने से ‘सुपरबग्स’ पैदा हो रहे हैं, जिन पर दवाओं का कोई असर नहीं होता।
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आईसीएमआर की वैज्ञानिक डॉ. कामिनी वालिया के अनुसार, भारत में यह एक “साइलेंट महामारी” बन चुकी है। वर्ष 2021 में लगभग 2.6 लाख मौतें सीधे तौर पर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से जुड़ी थीं, जबकि करीब 9.8 लाख लोगों की मौत ऐसे संक्रमणों से हुई, जिन पर दवाएं असर नहीं कर सकीं।
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने लोगों को बुखार या हल्की बीमारी में खुद से एंटीबायोटिक्स लेने से मना किया। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक्स केवल पंजीकृत डॉक्टर के पर्चे पर लें, कोर्स पूरा करें और दूसरों के साथ दवाएं साझा न करें।
सरकार ने एएमआर से निपटने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना 2.0 लागू की है, जो 2025 से 2029 तक प्रभावी रहेगी। इसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, प्रयोगशालाओं को मजबूत करना और इंसानों, पशुओं व खाद्य क्षेत्र में एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के सही उपयोग को सुनिश्चित करना है।
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