सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत पर निर्णय लेते समय पीड़िता की सुरक्षा और मुकदमे की पवित्रता (sanctity of trial) सर्वोपरि महत्व रखती है। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी एक 2024 के सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) मामले में आरोपी को दी गई जमानत रद्द करते हुए की।
पीड़िता की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अप्रैल 2025 में पारित जमानत आदेश “न्याय के घोर उल्लंघन” (miscarriage of justice) के समान है। पीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय पीड़िता की सुरक्षा पर पड़ने वाले खतरे को पर्याप्त रूप से नहीं आंका, जबकि यह तथ्य सामने था कि पीड़िता और आरोपी एक ही इलाके में रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि POCSO अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में अदालतों को अत्यंत संवेदनशीलता और सतर्कता के साथ जमानत याचिकाओं पर विचार करना चाहिए। ऐसे मामलों में केवल आरोपी के अधिकारों को ही नहीं, बल्कि पीड़िता की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा, समाज में उस पर पड़ने वाले दबाव, गवाहों को प्रभावित करने की आशंका और निष्पक्ष सुनवाई की संभावना को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
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पीठ ने कहा कि यदि आरोपी को जमानत मिलने से पीड़िता के जीवन, स्वतंत्रता या बयान देने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो यह सीधे तौर पर न्याय प्रक्रिया को कमजोर करता है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि नाबालिग पीड़िताओं के मामलों में डर और सामाजिक दबाव के कारण वे पहले से ही बेहद असुरक्षित स्थिति में होती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि POCSO जैसे गंभीर कानूनों के तहत मामलों में जमानत कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं हो सकती और निचली अदालतों को पीड़िता-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया।
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