सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी आरोपी को केवल “सबक सिखाने” या उसे जेल का “स्वाद चखाने” के उद्देश्य से जमानत से वंचित करना पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने दोहराया कि किसी भी विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल) को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए, जब तक कि उसका दोष सिद्ध न हो जाए, चाहे आरोप कितने ही गंभीर क्यों न हों।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रवर्तन एजेंसियों और जांच संस्थानों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केवल यह तर्क कि आरोपी पर “गंभीर अपराध” का आरोप है या उसे किसी सख्त कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है, उसके मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि निर्दोषता की धारणा कानून की बुनियादी अवधारणा है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
पीठ ने इस प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई कि कई बार जांच एजेंसियां जानबूझकर ऐसी रणनीति अपनाती हैं, जिससे विचाराधीन कैदियों को लंबे समय तक जेल में रखा जा सके। अदालत ने कहा कि जमानत पर निर्णय का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि आरोपी को सजा देना। सजा केवल दोष सिद्ध होने के बाद ही दी जा सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत को अपवाद और जेल को नियम बनाने की सोच लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी आरोपी को लंबे समय तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रखना उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
पीठ ने जांच एजेंसियों से अपेक्षा जताई कि वे कानून के दायरे में रहते हुए निष्पक्ष और संवेदनशील रवैया अपनाएं। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य दंडात्मक नहीं, बल्कि न्यायसंगत और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाला होना चाहिए।
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब देशभर में लंबे समय से विचाराधीन कैदियों की संख्या और जमानत से जुड़े मामलों पर गंभीर बहस चल रही है।
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