दिल्ली हाईकोर्ट ने तुर्कमान गेट हिंसा मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी इलाके में मौजूद राहगीरों को केवल इस आधार पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता कि वे भीड़ का हिस्सा थे। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब वह साजिद इकबाल नामक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
न्यायमूर्ति प्रतीक जालान ने दिल्ली पुलिस से कहा कि वे आरोपी की भूमिका से जुड़ी विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट और वीडियो साक्ष्य अदालत में पेश करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि वीडियो में आरोपी भीड़ को भड़काते हुए दिखाई देते हैं, तो पुलिस की कार्रवाई उचित होगी, लेकिन यदि वह सिर्फ वहां से गुजर रहे थे, तो उन्हें गिरफ्तार करना सही नहीं माना जाएगा।
सुनवाई के दौरान पुलिस ने अदालत को बताया कि मामले में “गहरी साजिश” की जांच की जा रही है और आरोप है कि आरोपी ने बैरिकेड हटाकर भीड़ को उकसाया था। इस पर अदालत ने कहा कि वीडियो को उचित टाइम स्टैम्प के साथ रिकॉर्ड पर लाया जाए ताकि आरोपी की भूमिका स्पष्ट हो सके।
और पढ़ें: कैश-फॉर-क्वेरी मामला: महुआ मोइत्रा के खिलाफ चार्जशीट पर फैसला लेने के लिए लोकपाल को दो महीने की और मोहलत
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनका मुवक्किल पत्थरबाजी करने वाली भीड़ का हिस्सा नहीं था और वह अपने रिश्तेदार के घर से लौटते समय भीड़ में धक्का देकर शामिल कर दिया गया था।
इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने 21 जनवरी को अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि जांच शुरुआती चरण में है तथा वीडियो में आरोपी भीड़ जुटाते हुए दिखाई देता है।
यह मामला 6 और 7 जनवरी की रात रामलीला मैदान के पास फैज-ए-इलाही मस्जिद के निकट अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, सोशल मीडिया पर मस्जिद तोड़े जाने की अफवाह फैलने के बाद 150-200 लोगों की भीड़ जमा हो गई थी और पत्थर व बोतलें फेंकी गईं, जिससे छह पुलिसकर्मी घायल हुए।
और पढ़ें: तुर्कमान गेट हिंसा मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को दी गई जमानत रद्द की