उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दी गई थी।
मंगलवार को शिवसेना (यूबीटी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा। यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के सामने रखा गया। कामत ने पीठ से इस याचिका पर बुधवार को सुनवाई करने का आग्रह किया। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "हम देखेंगे।"
अधिवक्ता देवदत्त कामत ने बताया कि 18 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के शिंदे गुट वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दी थी। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष ने इस विलय को मान्यता दे दी है और यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर की घटना बन गया है, जहां सांसद उन लोगों के साथ जा रहे हैं जिनके खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी।
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संजय राउत ने फैसले को बताया लोकतंत्र की हत्या
उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे "लोकतंत्र का बलात्कार और हत्या" करार दिया। राउत ने कहा कि शिवसेना (यूबीटी) के चुनाव चिन्ह "जलती मशाल" पर जीतने वाले सांसदों को खरीदा गया है।
उन्होंने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब इसमें दल-बदल या विलय को लेकर नियम स्पष्ट हैं, तो लोकसभा अध्यक्ष ने इस विलय को मंजूरी कैसे दे दी।
सोनम वांगचुक मामले पर भी केंद्र को घेरा
संजय राउत ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के मामले में भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर प्रकार के विरोध की अनुमति होनी चाहिए।
राउत ने कहा कि महात्मा गांधी ने भी अनशन का रास्ता अपनाकर ब्रिटिश सरकार को बातचीत के लिए मजबूर किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि वांगचुक के अनशन के दौरान सरकार ने बातचीत करने के बजाय उन्हें प्रदर्शन स्थल से अस्पताल पहुंचाया।
वांगचुक कथित नीट परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों की मौत से जुड़े मुद्दों को लेकर सीजेपी समर्थित प्रदर्शन के तहत अनिश्चितकालीन अनशन पर थे।
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