भारत में आधुनिक मुकदमों के पीछे हिंसा, लोभ, काम और क्रोध मुख्य कारण बन गए हैं, यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश दीपंकर दत्ता ने सोमवार को एक भूमि सौदे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।
न्यायमूर्ति दत्ता ने अदालत में कहा, “हिंसा (violence), लोभ (greed), काम (desire) और क्रोध (anger) अब मुकदमों के प्रमुख ट्रिगर बन गए हैं।” उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अक्सर ये भावनाएँ और लालच जमीन और संपत्ति से जुड़े विवादों में कानूनी लड़ाई का कारण बन जाते हैं।
इस टिप्पणी के कुछ समय पहले ही भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी जमीन कानूनों के उल्लंघन के मामलों में अधिकारियों और निजी बिल्डरों के गहरे गठजोड़ की बात कही थी। उन्होंने बताया था कि कई बार सरकारी अधिकारियों का निजी विकासकर्ताओं के साथ हाथ मिलाना कानून के उल्लंघन और भूमि संबंधी विवादों को बढ़ावा देता है।
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न्यायाधीश दत्ता के अनुसार, इन चार भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारणों के चलते भारतीय न्यायपालिका में मुकदमेबाजी का स्तर लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि केवल कानूनी प्रक्रियाएँ ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज में नैतिक और सामाजिक चेतना को भी मजबूत करना आवश्यक है ताकि विवादों के पीछे के मूल कारणों को समझा जा सके और उन्हें कम किया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि और संपत्ति से जुड़े विवादों में हिंसा और लालच का होना केवल कानूनी चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या भी है। इस पर ध्यान देने से न्यायपालिका की कार्यक्षमता बढ़ सकती है और समाज में न्याय की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
न्यायाधीश दत्ता की यह टिप्पणी इस बात पर प्रकाश डालती है कि आधुनिक भारत में मुकदमों के पीछे केवल कानूनी मुद्दे नहीं, बल्कि मानवीय भावनाएँ और लालच भी अहम भूमिका निभाते हैं।
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