अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद पश्चिम एशिया में नए भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, जिससे भारत के लिए कई रणनीतिक और आर्थिक अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। नई व्यवस्था में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने इस्लामाबाद का दौरा कर पाकिस्तान को मध्यस्थता के लिए धन्यवाद दिया और एक नए क्षेत्रीय मुस्लिम सुरक्षा ढांचे का प्रस्ताव रखा। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं का समर्थन किया।
इसी बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खाड़ी देशों की यात्रा कर सहयोगियों को भरोसा दिलाया और ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर शुल्क लगाने से चेतावनी दी।
भारत की स्थिति इस पूरे घटनाक्रम में बेहद संतुलित बनी हुई है। भारत के ईरान और खाड़ी देशों दोनों से मजबूत व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध हैं, जिसके कारण किसी भी एकीकृत इस्लामिक गठबंधन की संभावना कम मानी जा रही है। भारत का चाबहार पोर्ट निवेश सुरक्षित बना रहेगा, हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तनाव के लिए सतर्कता आवश्यक होगी।
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विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका-ईरान समझौता, जिसमें नौसैनिक प्रतिबंध हटाना, होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करना और ईरानी तेल के लिए आर्थिक छूट शामिल है, क्षेत्रीय गठबंधनों को पूरी तरह बदल रहा है।
इस बदलाव से भारत को कई लाभ मिल सकते हैं। ईरानी तेल निर्यात बहाल होने से वैश्विक ऊर्जा कीमतें कम होंगी, जिससे भारत में महंगाई घटेगी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। इसके अलावा भारत इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं के ठेकों में भागीदारी बढ़ा सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में निर्बाध आवागमन सुनिश्चित होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासी श्रमिकों तथा उनके रेमिटेंस प्रवाह को सुरक्षा मिलेगी।
अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और चाबहार पोर्ट जैसे परियोजनाओं को भी नई गति मिल सकती है, जिससे भारत की मध्य एशिया तक पहुंच आसान होगी।
विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने भी कहा है कि भारत पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता का समर्थन करता है और अमेरिका-ईरान समझौते को तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानता है।
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