महाराष्ट्र की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के बीच चल रहा टकराव अब एक वैचारिक बहस का रूप ले चुका है, जिसमें सावरकर बनाम अंबेडकर की चर्चा केंद्र में आ गई है। 15 जनवरी को होने वाले राज्य की 29 नगर निगमों के चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे दोनों दलों के बीच सियासी बयानबाज़ी तेज होती जा रही है।
भाजपा नेताओं ने हाल ही में हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर के एक प्रसिद्ध कथन का हवाला देकर एनसीपी पर निशाना साधा। यह बयान मूल रूप से 1937 में दिया गया था, जब सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे। उस समय मुस्लिम लीग और एम.ए. जिन्ना के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण थे। सावरकर का यह कथन—“यदि आप हमारे साथ आते हैं तो हम आपके साथ हैं, यदि नहीं आते तो भी हम आगे बढ़ेंगे, और यदि विरोध करेंगे तो भी आपके बावजूद हिंदुत्व विजयी होगा”—अब महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति में फिर से चर्चा में है।
भाजपा ने इस उद्धरण का इस्तेमाल एनसीपी और खासतौर पर अजित पवार के नेतृत्व वाली पार्टी द्वारा लगाए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता से पीछे हटने वाली नहीं है।
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इसके जवाब में एनसीपी ने स्पष्ट किया कि वह “शिव-शाहू-फुले-अंबेडकर विचारधारा” के प्रति प्रतिबद्ध है। पार्टी नेताओं ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की विरासत को याद करते हुए सामाजिक न्याय, समानता और समावेशी राजनीति पर जोर दिया। एनसीपी का तर्क है कि महाराष्ट्र की राजनीति की जड़ें समाज सुधार और लोकतांत्रिक मूल्यों में हैं, न कि केवल सांप्रदायिक विचारधारा में।
इस तरह, नगर निकाय चुनावों की पृष्ठभूमि में भाजपा और एनसीपी के बीच का राजनीतिक संघर्ष अब केवल सत्ता या गठबंधन तक सीमित न रहकर सावरकर और अंबेडकर की वैचारिक विरासतों की टकराहट में बदलता दिखाई दे रहा है, जो मतदाताओं को भी वैचारिक आधार पर प्रभावित करने की कोशिश है।
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