महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों से पहले राजनीति पूरी तरह से ‘फ्री-फॉर-ऑल’ के रूप में सामने आ रही है, जहां न कोई स्पष्ट लाल रेखा बची है और न ही वैचारिक प्रतिबद्धता। चुनावी जीत की होड़ में राजनीतिक दल ऐसे तत्वों को भी अपनाने से नहीं हिचक रहे हैं, जिनका न तो कोई राजनीतिक सिद्धांत है और न ही सार्वजनिक जीवन की बुनियादी मर्यादाओं से कोई लेना-देना।
15 जनवरी को राज्य की 29 नगर निगमों के लिए होने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरण बेहद उलझे हुए नजर आ रहे हैं। कहीं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन में है, तो पड़ोसी शहर में यही दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में हैं। इसी तरह, अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) एक शहर में शरद पवार गुट के साथ मिलकर बीजेपी को चुनौती दे रही है। इन विरोधाभासी गठबंधनों ने मतदाताओं को भी असमंजस में डाल दिया है।
यह दूसरा चरण है, क्योंकि करीब दो हफ्ते पहले छोटे नगर परिषदों के चुनाव हो चुके हैं। इसके बाद जिला परिषदों के चुनाव कराए जाएंगे। इन शहरी निकाय चुनावों को ‘मिनी विधानसभा चुनाव’ कहा जा रहा है। लंबे समय से—करीब छह से सात वर्षों से—स्थानीय निर्वाचित निकाय न होने के कारण इन चुनावों का महत्व और आकर्षण और भी बढ़ गया है।
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हालांकि, इन चुनावों ने भारतीय राजनीति के कुछ बेहद कुरूप, असहज और अवसरवादी चेहरे को उजागर कर दिया है। उम्मीदवारों की भरमार और सत्ता की लालसा ने चुनावी प्रक्रिया को अव्यवस्थित बना दिया है। मौजूदा हालात किसी तीसरे दर्जे की बॉलीवुड थ्रिलर फिल्म जैसे लगते हैं, जहां हर मोड़ पर नए गठबंधन, टूटते रिश्ते और अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में इस तरह का दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया।
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