16वें वित्त आयोग (एफसी) की सिफारिशों के तहत केंद्र से राज्यों को मिलने वाले कर राजस्व के बंटवारे में दक्षिणी राज्यों की सामूहिक हिस्सेदारी भले ही पहले के मुकाबले बढ़ी हो, लेकिन तमिलनाडु को इससे कोई खास राहत नहीं मिली है। आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु की हिस्सेदारी में बेहद मामूली वृद्धि दर्ज की गई है।
15वें वित्त आयोग में तमिलनाडु की हिस्सेदारी 4.079 प्रतिशत थी, जो 16वें वित्त आयोग में बढ़कर 4.097 प्रतिशत हो गई है। यह वृद्धि महज 0.44 प्रतिशत की दर को दर्शाती है, जिसे बेहद सीमित माना जा रहा है। इसके मुकाबले तेलंगाना की हिस्सेदारी में 3.43 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश की हिस्सेदारी में 4.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में कर्नाटक और केरल ऐसे राज्य हैं, जहां दोहरे अंकों में वृद्धि दर्ज की गई है। कर्नाटक की हिस्सेदारी में 13.27 प्रतिशत और केरल की हिस्सेदारी में 23.74 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अखिल भारतीय स्तर पर केरल की वृद्धि दर हरियाणा (24.52 प्रतिशत) के बाद दूसरे स्थान पर है, जबकि तीसरे स्थान पर कर्नाटक है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि क्षैतिज वितरण (Horizontal Devolution) के तहत जिन मानदंडों को आधार बनाया गया है, उनके भार (वेटेज) में बदलाव का असर तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों पर पड़ा है। क्षेत्रफल, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन और प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) जैसे मानकों को कम महत्व दिए जाने से इन राज्यों को अपेक्षाकृत नुकसान हुआ है।
हालांकि ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution) के तहत दक्षिणी राज्यों की कुल हिस्सेदारी में इजाफा हुआ है, लेकिन तमिलनाडु जैसे आर्थिक रूप से मजबूत और बेहतर जनसांख्यिकीय प्रदर्शन करने वाले राज्य को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया। इसको लेकर राज्य में असंतोष के स्वर भी सुनाई देने लगे हैं।
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