किसी भी देश की आर्थिक ताकत इस बात से गहराई से जुड़ी होती है कि वह अपने माल को कितनी कुशलता से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा सकता है। भारत जैसी बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए तेज, सस्ती और भरोसेमंद माल ढुलाई केवल बुनियादी ढांचे की जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की मजबूत नींव है। ऐसे में भारत के समर्पित माल ढुलाई गलियारे यानी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) का पूरा होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विकास रणनीति में बुनियादी ढांचे को केंद्रीय स्थान दिया है। उनके नेतृत्व में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी दीर्घकालिक परियोजनाओं को लगातार गति मिली है। वर्षों पहले देश के व्यस्त रेलवे मार्गों पर भीड़ कम करने के उद्देश्य से तैयार की गई यह योजना अब आधुनिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारा 1,337 किलोमीटर लंबा है और पंजाब के लुधियाना से बिहार के सोननगर तक जाता है। वहीं, पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारा 1,506 किलोमीटर लंबा है, जो दादरी को जवाहरलाल नेहरू पोर्ट से जोड़ता है। दोनों गलियारों की कुल लंबाई 2,843 किलोमीटर है। रेलवे मंत्रालय के अनुसार, दोनों गलियारे अब पूरे होकर चालू हो चुके हैं और इन पर प्रतिदिन औसतन 443 से अधिक मालगाड़ियां संचालित हो रही हैं।
और पढ़ें: नोएडा में सेक्टर-51 और 52 मेट्रो स्टेशनों को जोड़ने वाला एसी स्काईवॉक खुला, तीन साल में 10 बार टली समयसीमा
डीएफसी की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि इससे मालगाड़ियों के लिए अलग रेलवे ट्रैक उपलब्ध होते हैं। पहले माल और यात्री ट्रेनों को एक ही रेलवे ढांचे का इस्तेमाल करना पड़ता था, जिससे व्यस्त मार्गों पर माल ढुलाई के कारण यात्री सेवाओं की क्षमता प्रभावित होती थी। अलग गलियारों से मालगाड़ियों की गति, क्षमता और समयबद्धता बेहतर होती है।
इससे पारंपरिक रेलवे मार्गों पर भीड़ कम होने के साथ यात्री और अन्य सेवाओं के लिए अतिरिक्त मार्ग उपलब्ध हो रहे हैं। भारतीय उद्योग के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि कच्चे माल, उत्पादन केंद्रों, गोदामों, बाजारों और बंदरगाहों के बीच तेज आपूर्ति श्रृंखला प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाती है।
पश्चिमी डीएफसी की जवाहरलाल नेहरू पोर्ट से सीधी कनेक्टिविटी विशेष रणनीतिक महत्व रखती है। इससे निर्यात-आयात माल की आवाजाही तेज होगी, औद्योगिक केंद्रों और बंदरगाहों के बीच संपर्क मजबूत होगा तथा मुंबई के रेलवे नेटवर्क पर दबाव कम होगा।
इसका लाभ किसानों को भी मिल सकता है। कृषि उत्पादों को लंबी दूरी तक तेजी और भरोसेमंद तरीके से पहुंचाने में बेहतर माल ढुलाई व्यवस्था मददगार होगी। इससे उत्पादन केंद्रों को उपभोग केंद्रों और बंदरगाहों से जोड़ने के अवसर बढ़ेंगे।
डीएफसी पर्यावरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। लंबी दूरी तक बड़ी मात्रा में माल पहुंचाने में रेल परिवहन सामान्यतः सड़क परिवहन की तुलना में अधिक ऊर्जा-कुशल होता है। विद्युतीकृत डीएफसी और उच्च क्षमता वाली मालगाड़ियों से हरित लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा मिल सकता है।
पश्चिमी डीएफसी पर डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेनें चलाने की क्षमता भी माल परिवहन की दक्षता बढ़ाती है। एक ही आवाजाही में अधिक माल पहुंचने से बुनियादी ढांचे का बेहतर इस्तेमाल संभव होता है।
डीएफसी केवल रेलवे परियोजना नहीं, बल्कि औद्योगिक गलियारों, लॉजिस्टिक्स पार्कों, बंदरगाहों, गोदामों और मल्टीमॉडल परिवहन व्यवस्था से जुड़ा व्यापक आर्थिक तंत्र है। प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति और अन्य सुधारों के साथ यह नेटवर्क भारत की आपूर्ति श्रृंखला को अधिक आधुनिक और तकनीक आधारित बनाने में मदद कर रहा है।
भारत के 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के लिए ऐसे बुनियादी ढांचे की अहम भूमिका होगी। बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ कच्चे माल, कृषि उत्पादों, तैयार वस्तुओं और निर्यात-आयात माल की आवाजाही भी बढ़ेगी। डीएफसी इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है।
समर्पित माल ढुलाई गलियारा केवल रेलवे पटरियों का विस्तार नहीं है। यह समय की बचत, परिवहन लागत में कमी, बाजारों के बेहतर जुड़ाव और नए आर्थिक अवसरों का प्रतीक है। इसकी पूरी क्षमता आने वाले वर्षों में सामने आएगी और यह भारत को तेज, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
और पढ़ें: बिहार में गंगा किनारे 126 किलोमीटर लंबे मरीन ड्राइव की योजना, 70 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे: सम्राट चौधरी