बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि घर लौटती बेटी के स्वागत का उत्सव भी है। यहां मां दुर्गा को अतिथि की तरह नहीं, बल्कि बेटी के रूप में देखा जाता है, जो मायके लौटती हैं। यही वजह है कि पूजा के दौरान भोजन की परंपराएं भी बंगाल की संस्कृति और पारिवारिक विरासत से जुड़ी हैं।
कई बंगाली परिवारों में दुर्गा पूजा के दौरान मछली और मांस बनाना सामान्य बात है। इसे धार्मिकता से अलग नहीं माना जाता। शाक्त परंपरा में देवी को अर्पित भोजन भोग बन जाता है और बाद में प्रसाद के रूप में लोगों में बांटा जाता है।
नवमी का दिन इस परंपरा के लिए विशेष माना जाता है। अष्टमी पर जहां अंजलि, खिचड़ी और लाबड़ा जैसे सात्विक व्यंजन प्रमुख होते हैं, वहीं नवमी पर कई पारंपरिक बंगाली परिवारों में मांसाहारी भोग की परंपरा देखने को मिलती है।
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कुछ बोनदी बाड़ी यानी पारंपरिक बंगाली परिवारों में आज भी बलि की पुरानी परंपरा की स्मृति मौजूद है। कई जगहों पर मांस को बिना प्याज और लहसुन के पकाया जाता है, जिसे मजाक में ‘निरामिष मांस’ कहा जाता है।
संधि पूजा अष्टमी और नवमी के बीच का महत्वपूर्ण समय है। पंचांग के अनुसार यह 48 मिनट का संधिकाल होता है, जिसमें अष्टमी के 24 और नवमी के 24 मिनट शामिल होते हैं। मान्यता है कि इसी समय मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था।
हालांकि हर बंगाली परिवार मांसाहारी भोग नहीं खाता। शाकाहारी लोगों के लिए खिचड़ी, लाबड़ा, लूची, छोले की दाल, आलू दम, चटनी, पायस और मिष्टी दोई भी पूजा का अभिन्न हिस्सा हैं।
यही बंगाल की खासियत है—एक ही दुर्गा पूजा में मछली-मांस का भोग और पूरी तरह शाकाहारी प्रसाद, दोनों अपनी जगह सम्मानित हैं।
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