आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चल रहे आबकारी नीति (शराब नीति) मामले की सुनवाई के दौरान स्वयं पेश होकर अपनी दलीलें रखीं। यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका से जुड़ा हुआ है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू भी सीबीआई की ओर से उपस्थित रहे।
केजरीवाल ने अदालत में कहा कि वह न्यायाधीश का सम्मान करते हैं और न्यायालय का भी आदर करते हैं। इस पर पीठ ने कहा कि सम्मान आपसी है और उन्हें मुद्दे पर केंद्रित रहना चाहिए।
केजरीवाल ने कहा, “मैं यहां एक आरोपी की तरह खड़ा हूं, जबकि निचली अदालत मुझे पहले ही बरी कर चुकी है।” उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि वह उनके उस आवेदन पर विचार करे जिसमें उन्होंने न्यायाधीश के रिक्यूजल (मामले से अलग होने) की मांग की है।
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उन्होंने आरोप लगाया कि 9 मार्च को उच्च न्यायालय ने सीबीआई की याचिका पर बिना किसी पक्ष की मौजूदगी के आदेश पारित किया था। केजरीवाल के अनुसार, अदालत ने निचली अदालत के फैसले में “प्रथम दृष्टया त्रुटि” बताई, जबकि यह मामला 40,000 से अधिक पन्नों का है और पूरा रिकॉर्ड पढ़े बिना आदेश दिया गया।
केजरीवाल ने कहा कि कानून के अनुसार असली सवाल यह नहीं है कि जज वास्तव में पक्षपाती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या किसी पक्ष को निष्पक्ष सुनवाई को लेकर उचित आशंका हो सकती है। उन्होंने कहा कि वे इस आशंका को साबित करने के लिए दस कारण प्रस्तुत करेंगे।
सुनवाई के दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया। वहीं सीबीआई की ओर से कहा गया कि अदालत कोई मंच नहीं है और आरोप निराधार हैं।
इससे पहले 27 फरवरी को निचली अदालत ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। बाद में हाईकोर्ट ने सीबीआई की याचिका पर सभी को नोटिस जारी किया था।
अब मामला जज के रिक्यूजल और निष्पक्ष सुनवाई के मुद्दे पर केंद्रित हो गया है, जिसकी अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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