केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा गुरुवार को बुलाए गए एकदिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल का देशभर में सामान्य जनजीवन पर व्यापक असर देखने को नहीं मिला। हड़ताल का आह्वान केंद्र सरकार की कथित "मजदूर विरोधी, किसान विरोधी और राष्ट्र विरोधी कॉरपोरेट समर्थक नीतियों" के विरोध में किया गया था।
हालांकि विभिन्न राज्यों से मिली रिपोर्टों के अनुसार, हड़ताल को मिला-जुला समर्थन प्राप्त हुआ। अधिकांश स्थानों पर कार्यालय, बैंक, निजी प्रतिष्ठान और सार्वजनिक सेवाएं सामान्य रूप से संचालित होती रहीं। आम लोगों की दैनिक गतिविधियों पर बड़े पैमाने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
ओडिशा में 12 घंटे के बंद के कारण जनजीवन कुछ हद तक प्रभावित हुआ। यहां प्रदर्शनकारियों ने प्रमुख सड़कों, राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों को अवरुद्ध किया, जिससे यातायात व्यवस्था बाधित हुई। कई स्थानों पर सार्वजनिक परिवहन सेवाएं प्रभावित रहीं और बसों का संचालन आंशिक रूप से ठप रहा। बाजार, शैक्षणिक संस्थान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी कुछ क्षेत्रों में बंद रहे।
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केरल, तमिलनाडु, गोवा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भी हड़ताल को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ स्थानों पर श्रमिक संगठनों और उनके समर्थकों ने रैलियां और प्रदर्शन आयोजित किए, जबकि अन्य क्षेत्रों में सामान्य कामकाज जारी रहा।
हड़ताल के आह्वान का उद्देश्य श्रम कानूनों में बदलाव, निजीकरण की नीतियों और किसानों से जुड़े मुद्दों के विरोध में सरकार पर दबाव बनाना था। ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि केंद्र की नीतियां श्रमिकों और किसानों के हितों के खिलाफ हैं और बड़े कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचा रही हैं।
वहीं, कई राज्यों में प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठाए। संवेदनशील इलाकों में पुलिस बल तैनात किया गया ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।
कुल मिलाकर, देशव्यापी हड़ताल का असर सीमित रहा और अधिकांश राज्यों में दैनिक जीवन सामान्य रूप से चलता रहा।
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