जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में 1931 के विद्रोह की बरसी से एक दिन पहले प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। रविवार 12 जुलाई 2026 को अधिकारियों ने नक्शबंद साहिब दरगाह की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेड लगा दिए। इस दरगाह में 1931 में डोगरा शासन के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान मारे गए 22 नागरिकों की कब्रें मौजूद हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पुलिस ने दरगाह के मुख्य प्रवेश द्वारों पर वाहनों को खड़ा कर रास्तों को अवरुद्ध कर दिया। इसके अलावा कई सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए हैं, ताकि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेता 13 जुलाई को विद्रोह की बरसी के अवसर पर वहां जाकर श्रद्धांजलि न दे सकें।
1931 का आंदोलन जम्मू-कश्मीर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। यह विद्रोह उस समय के डोगरा राजशाही शासन के खिलाफ हुआ था। हर साल 13 जुलाई को कई क्षेत्रीय नेता और संगठन उन लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए नक्शबंद साहिब दरगाह पहुंचते रहे हैं, जिन्हें इस आंदोलन के दौरान मारा गया था।
और पढ़ें: मिच मैककॉनेल अभी नहीं लौट पाएंगे अमेरिकी सीनेट, गिरने और निमोनिया से हो रहे हैं स्वस्थ
हालांकि, वर्ष 2019 में केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किए जाने के बाद से उपराज्यपाल प्रशासन ने क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को इस स्थान पर आधिकारिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी है।
प्रशासन की ओर से इस बार बैरिकेड लगाने के पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दिया गया है। अधिकारियों का मानना है कि किसी भी संभावित अप्रिय घटना को रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाए गए हैं।
वहीं, कुछ स्थानीय नेताओं और संगठनों ने प्रशासन के इस कदम की आलोचना की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं को याद करने और मृतकों को श्रद्धांजलि देने का अधिकार लोगों को मिलना चाहिए।
फिलहाल श्रीनगर में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है और संवेदनशील इलाकों में निगरानी रखी जा रही है। 13 जुलाई को होने वाले कार्यक्रमों को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है।
और पढ़ें: फ्रांस की फुटबॉल टीम पर टिप्पणी से घिरे स्पेन के पूर्व प्रधानमंत्री मारियानो रखोय, ज़ेनोफोबिक बयान पर विवाद