भारत के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 मार्च, 2026) को यह तय किया कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून के तहत ‘व्यक्तिगत डेटा’ की सही परिभाषा क्या होगी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब इस कानून पर आरोप लगे हैं कि इसे डेटा गोपनीयता के नाम पर सूचना के अधिकार (RTI) को बाधित करने के लिए अनुचित रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने की। पीठ ने कहा कि DPDP एक्ट, 2023 और इसके संबंधित नियम, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 के लागू होने के बाद ‘सार्वजनिक डेटा’ और ‘व्यक्तिगत डेटा’ की स्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता पैदा हुई है।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान DPDP कानून सरकारी निगरानी को असमान रूप से वैध बनाता है, नागरिकों के लिए मुआवजे की व्यवस्था नहीं करता, सूचना के अधिकार को कमजोर करता है और पत्रकारों के पेशेवर कामकाज को प्रभावित करता है। याचिका में न्यायालय से इस विषय पर मार्गदर्शन देने की अपील की गई है कि कौन सा डेटा व्यक्तिगत है और किसे सार्वजनिक माना जा सकता है।
और पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CJI को बचाने के लिए केस दायर करने पर ₹1 करोड़ मांगने वाली याचिका खारिज की
पीठ ने इस मामले की सुनवाई के लिए आगे की तारीख तय की और कहा कि कानून की व्याख्या और इसके प्रभावों को समझना आवश्यक है ताकि नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रह सकें।
विशेषज्ञों के अनुसार, DPDP कानून डिजिटल डेटा के व्यापक नियंत्रण के लिए ढांचा प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ ही यह सूचना के अधिकार और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रभाव डाल सकता है। अदालत के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो सकेगा कि व्यक्तिगत डेटा की सीमा क्या होगी और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
और पढ़ें: सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी पवन बिश्नोई और जगतार सिंह को दी जमानत