सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (19 जनवरी, 2026) को पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया है कि एसआईआर के दौरान व्यापक अनियमितताएं हुईं, जिसके कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग (ईसीआई) को निर्देश दिया कि जिन मतदाताओं के नामों में विसंगतियां पाई गई हैं, उनकी सूची ब्लॉक और वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए। साथ ही, पीठ ने कहा कि राज्य सरकार पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में चुनाव आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को आवश्यक मानव संसाधन उपलब्ध कराए।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के पहले चरण के लिए ड्राफ्ट मतदाता सूची 16 दिसंबर, 2025 को जारी की गई थी, जिसमें राज्य के 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए। मतदाता सूची में कई तरह की गड़बड़ियों की ओर ध्यान दिलाया गया, जैसे असामान्य रूप से अधिक युवा मतदाताओं की मृत्यु दर्शाना, नाम हटाने में लैंगिक असंतुलन और कुछ खास समुदायों के नाम अपेक्षाकृत अधिक संख्या में हटाया जाना।
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13 जनवरी, 2026 को हुई सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी थी कि एसआईआर प्रक्रिया में चुनाव आयोग की भूमिका केवल नागरिकता की पुष्टि तक सीमित है और इसका मतलब स्वतः निर्वासन नहीं होता। उन्होंने कहा कि निर्वासन का अधिकार केंद्र सरकार के अधीन है।
चुनाव आयोग ने एसआईआर के खिलाफ आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तिथि 19 जनवरी, 2026 तक बढ़ाई थी। इस बीच, 16 जनवरी को पश्चिम बंगाल में एसआईआर सुनवाई प्रक्रिया को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए, जिनके दौरान दो दिनों में दो ब्लॉक विकास अधिकारी (बीडीओ) कार्यालयों पर हमले भी हुए।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी प्रवेश पत्र (एडमिट कार्ड) भी स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं, जबकि वे लिखित दस्तावेज हैं और उन्हें मान्य माना जाना चाहिए। राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने यह भी बताया कि अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन को भी सुनवाई का नोटिस भेजा गया।
मुख्य न्यायाधीश कांत ने निर्देश दिया कि दस्तावेज जमा करने वाले मतदाताओं या उनके अधिकृत प्रतिनिधियों को रसीद दी जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
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