भारत के सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (21 जनवरी 2026) को मुसलमानों में प्रचलित तलाक के एक तरीके ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई होगी। इससे पहले 19 नवंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने संकेत दिया था कि वह इस मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने पर विचार कर सकती है। अदालत ने पति की ओर से नोटिस भेजे जाने की प्रथा की आलोचना भी की थी।
तलाक-ए-हसन इस्लामी कानून के तहत तलाक का एक तरीका है, जिसमें पति तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार ‘तलाक’ शब्द का उच्चारण करता है। यदि तीसरे महीने के अंत तक पति-पत्नी में सुलह नहीं होती, तो विवाह समाप्त माना जाता है। इस प्रक्रिया में बीच-बीच में सुलह की गुंजाइश रहती है, जिसे इसके समर्थक इसकी खासियत बताते हैं।
यह तरीका ट्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) से अलग है, जिसमें पति एक साथ तीन बार ‘तलाक’ कहकर तत्काल विवाह समाप्त कर देता था। ट्रिपल तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में असंवैधानिक घोषित कर दिया था और बाद में संसद ने इसे अपराध की श्रेणी में भी रखा।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में पक्षकारों से इस्लामी परंपराओं के तहत दिए जाने वाले विभिन्न प्रकार के तलाक पर लिखित नोट्स दाखिल करने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी प्रचलित धार्मिक प्रथा को पूरी तरह से रद्द करने का नहीं, बल्कि उसे संविधान की भावना और मूल अधिकारों के अनुरूप विनियमित करने से जुड़ा है।
अदालत का कहना है कि किसी भी धार्मिक प्रथा को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। ऐसे में तलाक-ए-हसन की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय की दिशा में अहम माना जा रहा है।
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