आज की डिजिटल दुनिया में जेन ज़ी पीढ़ी सोशल मीडिया के साथ पली-बढ़ी है। स्मार्टफोन, ऐप्स, स्क्रीन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन चुके हैं। दोस्ती, जानकारी, मनोरंजन और पहचान—सब कुछ सोशल मीडिया के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है। लेकिन इसी सुविधा के पीछे एक ऐसा दबाव छिपा है, जो धीरे-धीरे युवाओं के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
कामकाजी जीवन में नए-नए कदम रखने वाले युवाओं को पहले ही अपेक्षाओं, जिम्मेदारियों और बदलावों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सोशल मीडिया एक “खामोश तनाव” बनकर सामने आता है। कई युवा यह महसूस करते हैं कि आमने-सामने बातचीत की ज़रूरत ही नहीं रही, क्योंकि सब कुछ पहले से ऑनलाइन पता होता है। किसी को लगता है कि उसके साथी उससे कहीं ज़्यादा सफल हैं, तो किसी को डर सताता है कि अगर उसकी ज़िंदगी ‘परफेक्ट’ नहीं दिखी तो लोग उसे कमतर समझेंगे।
यह तुलना का दबाव सिर्फ सोच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि डर का रूप ले लेता है—कुछ छूट जाने का डर, दूसरों की नज़र में असफल दिखने का डर और “पर्याप्त न होने” का डर। सोशल मीडिया इन भावनाओं को और तेज़ कर देता है, क्योंकि यहाँ हर व्यक्ति अपनी ज़िंदगी का सबसे चमकदार हिस्सा ही दिखाता है।
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शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग चिंता, अवसाद और अकेलेपन को बढ़ा सकता है। वजह साफ है—क्यूरेटेड और फिल्टर की गई ज़िंदगियों को देखकर लोग अपनी असल ज़िंदगी से तुलना करने लगते हैं। किसी की प्रमोशन पोस्ट, छुट्टियों की तस्वीर या परफेक्ट सेल्फी देखकर अपनी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, थोड़े समय का सोशल मीडिया ब्रेक भी मानसिक तनाव, अवसाद और नींद की समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।
सोशल मीडिया का असर सिर्फ मानसिक नहीं, शारीरिक भी है। देर रात तक स्क्रॉल करने से नींद प्रभावित होती है, ध्यान भटकता है, साइबर बुलिंग और गलत जानकारी का खतरा बढ़ता है। समय के साथ यह सब मानसिक मजबूती को कमजोर करता है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सोशल मीडिया से दूरी नहीं, बल्कि संतुलन ज़रूरी है। समय सीमा तय करना, नोटिफिकेशन बंद करना, वास्तविक रिश्तों को प्राथमिकता देना, ऑफलाइन गतिविधियों में समय बिताना और नकारात्मक कंटेंट से दूरी बनाना जरूरी कदम हैं।
सबसे अहम बात यह है कि किसी व्यक्ति की कीमत लाइक्स, कमेंट्स या फॉलोअर्स से तय नहीं होती। असली मूल्य चरित्र, कर्म और वास्तविक रिश्तों में छिपा होता है। सोशल मीडिया एक साधन है—लेकिन तभी तक, जब तक उसका नियंत्रण आपके हाथ में हो।
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