डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने अफगानिस्तान में नाटो की भूमिका को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि नाटो सहयोगी देशों के सैनिकों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना पूरी तरह “अस्वीकार्य” है। यह बयान उन्होंने शनिवार (23 जनवरी, 2026) को उस समय दिया, जब ट्रंप ने कहा था कि नाटो के सहयोगी देश अफगानिस्तान में अग्रिम मोर्चे से दूर रहे।
प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने कहा, “मैं पूरी तरह समझती हूं कि डेनमार्क के पूर्व सैनिकों ने क्यों कहा कि इस दर्द को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यह अस्वीकार्य है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अफगानिस्तान में सहयोगी सैनिकों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाएं।” इससे पहले डेनिश वेटरन्स एसोसिएशन ने भी कहा था कि वे ट्रंप की टिप्पणी सुनकर “स्तब्ध” हैं।
डेनिश वेटरन्स एसोसिएशन ने एक बयान में कहा, “डेनमार्क हमेशा अमेरिका के साथ खड़ा रहा है और जब भी अमेरिका ने दुनिया के किसी भी संकट क्षेत्र में बुलाया, हमने वहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।” ट्रंप के बयान के विरोध में डेनमार्क के पूर्व सैनिकों ने 31 जनवरी को कोपेनहेगन में एक मौन मार्च निकालने का आह्वान किया है।
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प्रधानमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि डेनमार्क उन नाटो देशों में शामिल है, जिन्हें प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। 2003 में डेनमार्क की आबादी लगभग 54 लाख थी और वर्षों में करीब 12,000 डेनिश सैनिकों को अफगानिस्तान भेजा गया।
उन्होंने कहा, “मेरी संवेदनाएं सभी पूर्व सैनिकों, उनके परिवारों और प्रियजनों के साथ हैं, जिन्होंने ऐसा अपमान किसी भी रूप में नहीं झेला जाना चाहिए था।”
ट्रंप ने 22 जनवरी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि नाटो देश अफगानिस्तान तो गए, लेकिन वे अग्रिम मोर्चे से कुछ पीछे रहे। इस बयान से ब्रिटेन समेत कई देशों में नाराजगी फैल गई, जहां अफगानिस्तान मिशन में 457 सैनिक मारे गए थे।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ट्रंप की टिप्पणी को “अपमानजनक और चौंकाने वाला” बताया। हालांकि, व्हाइट हाउस ने ट्रंप का बचाव करते हुए कहा कि नाटो के लिए अमेरिका ने सबसे अधिक योगदान दिया है।
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