पश्चिम एशिया में बढ़ते सुरक्षा तनाव के बीच सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' (मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट) के तहत यदि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते को नाटो जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
यह समझौता मक्का स्थित अल-सफ़ा पैलेस में आयोजित मक्का अल-मुकर्रमा संयुक्त रक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान हुआ। इस अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन मौजूद रहे।
भारत इस समझौते पर करीबी नजर बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा कि सरकार इस घटनाक्रम पर लगातार निगरानी रख रही है और इसके सभी रणनीतिक पहलुओं का अध्ययन कर रही है। नई दिल्ली विशेष रूप से इस सैन्य गठबंधन, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और पाकिस्तान की सामरिक क्षमताओं के संभावित विस्तार के प्रभावों का आकलन कर रही है।
और पढ़ें: ट्रैविस हेड ने लगातार दूसरी बार जीता एलन बॉर्डर मेडल, एलेक्स कैरी को एक वोट से हराया
समझौते का उद्देश्य किसी भी बाहरी आक्रमण के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना और रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देना है। इसके तहत संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा तकनीक, खुफिया सहयोग और सुरक्षा समन्वय को बढ़ावा दिया जाएगा। तीनों देशों ने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और साझा सुरक्षा को मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य सहित पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं। इससे पहले भी पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग बढ़ा था, जिस पर भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के दृष्टिकोण से गंभीरता से विचार करने की बात कही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई रक्षा संधि आने वाले समय में पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति को प्रभावित कर सकती है।
और पढ़ें: दिल्ली कैबिनेट ने निजी विश्वविद्यालय विधेयक को दी मंजूरी, जानिए क्या हैं इसकी प्रमुख विशेषताएं