अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के प्रबंधन के लिए एक नए वैश्विक मंच — “बोर्ड ऑफ पीस” — के गठन का प्रस्ताव दिए जाने से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को लेकर नई बहस छिड़ गई है। गाज़ा संघर्ष की पृष्ठभूमि में घोषित इस पहल ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या वॉशिंगटन अब युद्ध और शांति से जुड़े वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दरकिनार करना चाहता है?
ट्रंप ने विश्व नेताओं को आमंत्रित करते हुए कहा है कि यह नया मंच अंतरराष्ट्रीय टकरावों के समाधान में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला है। इनमें संप्रभु समानता, सार्वभौमिक सदस्यता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया जैसे आधारभूत मूल्य शामिल हैं।
संयुक्त राष्ट्र की अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि सभी देश — चाहे बड़े हों या छोटे — औपचारिक रूप से समान हैं और खुले विमर्श में भाग लेते हैं। इसके विपरीत, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का विचार एक ऐसे विशेष और सीमित मंच की ओर इशारा करता है, जिसमें केवल चुने हुए देशों को आमंत्रित किया जाएगा और जिसकी अगुवाई अमेरिका करेगा। इससे यह आशंका गहराती है कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया और अधिक केंद्रीकृत और असंतुलित हो सकती है।
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इस प्रस्ताव के संदर्भ में भारत की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। अमेरिका जहां संयुक्त राष्ट्र के दायरे और प्रभाव को नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है, वहीं भारत को बहुपक्षीय व्यवस्था, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली और संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर अपने रुख को स्पष्ट करना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसी पहलें आगे बढ़ती हैं, तो इससे मौजूदा वैश्विक संस्थानों की प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन का स्वरूप बदल सकता है।
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