पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। 2016, 2021 और अब आने वाले 2026 विधानसभा चुनाव तक राज्य की चुनावी तस्वीर काफी बदल चुकी है। 294 सीटों वाली विधानसभा में मुख्य मुकाबला अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच केंद्रित होता दिखाई दे रहा है।
2016 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 211 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया था। उस समय वाम मोर्चा और कांग्रेस के गठबंधन को केवल 32 सीटों से संतोष करना पड़ा। वहीं भारतीय जनता पार्टी केवल 3 सीटें जीत पाई थी, जिनमें मुख्य रूप से दार्जिलिंग और कुछ शहरी क्षेत्र शामिल थे।
हालांकि 2021 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण में बड़ा बदलाव आया। भाजपा ने हिंदुत्व और एनआरसी जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ते हुए 77 सीटें जीत लीं और राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा को जंगलमहल क्षेत्र—जिसमें पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया और बांकुरा शामिल हैं—और उत्तर बंगाल के जिलों में बड़ी सफलता मिली।
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इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने मजबूत वापसी करते हुए 213 सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी को दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, हुगली, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रों में मजबूत समर्थन मिला, जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या अधिक है।
अब 2026 के चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष संशोधन के बाद करीब 63.66 लाख नाम हटाए गए हैं, जिससे 125 से अधिक सीटों के समीकरण बदलने की संभावना है। खासकर मतुआ समुदाय और सीमावर्ती क्षेत्रों में इसका असर देखने को मिल सकता है।
राज्य में बढ़ता आर्थिक घाटा, विकास के मुद्दे और क्षेत्रीय ध्रुवीकरण भी चुनावी राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। माना जा रहा है कि जहां टीएमसी 200 से अधिक सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं भाजपा 100 से ज्यादा सीटें जीतने की रणनीति बना रही है।
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