निजी संपत्ति पर बिना पुलिस अनुमति के प्रार्थना करने की अनुमति देने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का राज्य के अल्पसंख्यक संगठनों ने स्वागत किया है। ईसाई और मुस्लिम संगठनों ने इस निर्णय को “उम्मीद की किरण” बताते हुए कहा कि यह मनमानी पुलिस कार्रवाई के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संदेश है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मारानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज और इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा दायर दो समान याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना आयोजित करना कानून के तहत पूरी तरह वैध है और इसके लिए प्रशासन या पुलिस से पहले अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपनी निजी संपत्ति पर धार्मिक प्रार्थना सभा आयोजित करने से रोका नहीं जा सकता, जब तक कि इससे सार्वजनिक व्यवस्था या कानून-व्यवस्था को कोई खतरा न हो।
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अल्पसंख्यक संगठनों ने कहा कि इस फैसले से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूती मिली है और लोगों में विश्वास बढ़ा है कि उनके मौलिक अधिकार सुरक्षित हैं। उनका कहना है कि कई बार पुलिस या प्रशासन द्वारा अनावश्यक अनुमति की मांग से धार्मिक गतिविधियों में बाधा उत्पन्न होती थी, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि निजी स्थान पर प्रार्थना के लिए ऐसी अनुमति जरूरी नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की पुनः पुष्टि करता है और भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करेगा।
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