भारत और जापान के बीच संबंध अब केवल कारों और इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं रहे हैं। जापानी संस्कृति, खान-पान, फैशन, एनीमे और मंगा भी भारतीय उपभोक्ताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यह बढ़ती सांस्कृतिक दिलचस्पी जापानी कंपनियों के लिए भारत में नए अवसर पैदा कर रही है।
1980 और 1990 के दशक में भारत में जापान की पहचान मुख्य रूप से तकनीक, सटीक इंजीनियरिंग और भरोसेमंद उत्पादों से जुड़ी थी। मारुति सुजुकी ने भारतीय परिवारों के बीच जापानी तकनीक और विश्वसनीयता की इस छवि को मजबूत किया। अब यह जुड़ाव जापानी जीवनशैली, डिजाइन और सांस्कृतिक विचारों तक फैल रहा है।
युवा भारतीयों के लिए एनीमे, मंगा और गेमिंग जापानी संस्कृति से जुड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन गए हैं। डोरेमॉन और पोकेमॉन जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों से शुरू हुआ यह सफर अब जापानी मनोरंजन की व्यापक दुनिया तक पहुंच चुका है। इसके साथ ही युवा जापानी भोजन आजमा रहे हैं, मंगा पढ़ रहे हैं और जापानी शैली से प्रभावित कपड़े खरीद रहे हैं।
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डेंट्सू के दक्षिण एशिया प्रमुख हर्ष रजदान और डेंट्सू इंडिया में स्पोर्ट्स एंड एंटरटेनमेंट प्रमुख योसुके मुराई के अनुसार, भारत में जापान को लेकर रुचि पिछले करीब 15 वर्षों में लगातार विकसित हुई है। उनका मानना है कि भारतीय उपभोक्ता अब केवल जापानी उत्पाद नहीं, बल्कि वहां की जीवनशैली और सोच को भी समझना चाहते हैं।
दोनों देशों के बीच परिवार, मेहमाननवाजी और दीर्घकालिक संबंधों जैसे कई साझा मूल्य भी हैं। हालांकि, भारतीय बाजार की विविधता को देखते हुए जापानी कंपनियों को अपनी मूल पहचान बरकरार रखते हुए स्थानीय जरूरतों के अनुरूप रणनीति बनानी पड़ती है।
फैशन क्षेत्र में यूनिक्लो इसका उदाहरण है। कंपनी की सोच ‘सादगी को बेहतर बनाना’ है, जिसमें सरल डिजाइन के साथ तकनीक और उपयोगिता पर जोर दिया जाता है। भारत जैसे विविध बाजार में भी रोजमर्रा की सुविधाजनक और व्यावहारिक पोशाक की जरूरत व्यापक है।
इस तरह भारत में जापानी ब्रांड्स की लोकप्रियता संस्कृति और उपयोगिता, दोनों के मेल से आगे बढ़ रही है।
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