भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने कानून के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि कानूनी व्यवस्था में “सहानुभूति” ही वह तत्व है जो एक न्यायपूर्ण समाज को अन्यायपूर्ण समाज से अलग करता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्याय की धारा को उन समुदायों की ओर मोड़ना जरूरी है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU) के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि आने वाले समय में दुनिया छात्रों का मूल्यांकन उनके चैंबर, वेतन और पेशेवर उपलब्धियों के आधार पर करेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ये सभी बातें न तो अप्रासंगिक हैं और न ही पूरी तरह तय।
जस्टिस सूर्यकांत ने छात्रों से आत्मविश्वास में जड़े हुए और चुनौतियों के सामने अडिग रहने वाले वकील बनने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “आपकी डिग्रियां इस बात का प्रतीक नहीं हैं कि आप कहां से आए हैं, बल्कि इस बात की स्वीकारोक्ति हैं कि आपने पहले ही क्या करने की क्षमता प्रदर्शित की है।”
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उन्होंने कहा कि कानूनी पेशा केवल व्यक्तिगत सफलता या आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य समाज में न्याय, समानता और करुणा को मजबूत करना होना चाहिए। CJI ने युवाओं को याद दिलाया कि कानून का सही उपयोग कमजोर, हाशिए पर खड़े और वंचित वर्गों को न्याय दिलाने में होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने छात्रों को यह भी सलाह दी कि वे अपने पेशेवर सफर में नैतिक मूल्यों, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण को कभी न छोड़ें। उन्होंने कहा कि सच्चा वकील वही है, जो कानून की समझ के साथ-साथ समाज की पीड़ा को भी महसूस कर सके।
CJI के इस संदेश को छात्रों और शिक्षकों ने प्रेरणादायक बताया, जो आने वाली पीढ़ी के कानूनी पेशेवरों को न्याय और संवेदना के संतुलन की सीख देता है।
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