भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार (11 जुलाई 2026) को कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका न्याय व्यवस्था में केवल एक सहायक की होनी चाहिए, न कि किसी न्यायाधीश की। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई का उपयोग प्रक्रियात्मक सुविधा बढ़ाने के लिए किया जा सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल मानव न्यायाधीशों के पास होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि डिजिटल विवाद समाधान और एआई जैसी तकनीकों का इस्तेमाल न्याय तक पहुंच को बेहतर बनाएगा या उसमें बाधा उत्पन्न करेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इन तकनीकों को कितनी सोच-समझ और सावधानी से लागू किया जाता है।
सीजेआई सूर्यकांत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब देश और दुनिया में न्यायिक क्षेत्र में एआई के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चर्चा तेज हो रही है। उन्होंने एआई पर पूरी तरह निर्भर रहने के खतरों को लेकर भी आगाह किया।
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उन्होंने कहा कि तकनीक न्यायिक प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन कानून की व्याख्या, तथ्यों का मूल्यांकन और न्यायिक विवेक का इस्तेमाल केवल प्रशिक्षित न्यायाधीश ही कर सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि एआई को न्यायिक व्यवस्था में शामिल करते समय पारदर्शिता, जवाबदेही और सावधानी जरूरी है। उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य न्याय प्रणाली को मजबूत बनाना होना चाहिए, न कि मानव निर्णय क्षमता को समाप्त करना।
हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट सहित कई न्यायिक संस्थानों ने एआई के उपयोग को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई कानूनी शोध, दस्तावेजों के विश्लेषण और प्रशासनिक कार्यों में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन न्याय देने की मूल प्रक्रिया में मानवीय सोच और संवेदनशीलता की भूमिका अहम बनी रहेगी।
सीजेआई सूर्यकांत ने अपने बयान के जरिए स्पष्ट किया कि भविष्य में तकनीक और न्यायपालिका का संबंध सहयोग का होगा, जिसमें एआई एक उपकरण के रूप में काम करेगा, निर्णयकर्ता के रूप में नहीं।
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