न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भारत में हुए प्रदर्शनों को लेकर मानवाधिकार हनन का मुद्दा बनाने की कोशिशों के बीच संयुक्त राष्ट्र और उसके संबद्ध संगठनों के दोहरे रवैये का पर्दाफाश हुआ है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट किया कि मानवाधिकार को राजनीतिक दबाव या किसी देश को चुनिंदा रूप से निशाना बनाने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह तीखी प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के उस बयान के बाद आई, जिसमें दावा किया गया था कि भारतीय अधिकारी शांतिपूर्ण सभाओं पर अनुचित प्रतिबंध लगा रहे हैं और जबरन गुमशुदगी जैसी घटनाओं में शामिल हैं। बयान में कहा गया था, "हमने भारतीय अधिकारियों को बार-बार शांतिपूर्ण सभा पर अनुचित प्रतिबंध, अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी हिरासत, जबरन गुमशुदगी और छात्र कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने जैसी घटनाओं के प्रति आगाह किया है।" विशेषज्ञों ने अधिकारियों से तुरंत अत्यधिक बल प्रयोग बंद करने, सामूहिक सभा प्रतिबंध रद्द करने और डिजिटल निगरानी के दुरुपयोग से बचने की मांग की थी।
वहीं, इसके ठीक उलट संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने फ्रांस और यूरोप के अन्य हिस्सों में हिंसक प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर कहीं अधिक नरम रुख़ अपनाया। टर्क ने तो प्रदर्शनकारियों को 'वैंडल्स' (उपद्रवी) तक कह डाला। उन्होंने कहा, "मैं हिंसा के सभी कृत्यों की निंदा करता हूं और इसमें शामिल सभी पक्षों से तनाव कम करने तथा आगे हिंसा रोकने की अपील करता हूं। आगे बढ़ने का सबसे अच्छा और एकमात्र रास्ता समावेशी और सुरक्षित संवाद है... मैं उन लोगों के कृत्यों की निंदा करता हूं जो सार्वजनिक और निजी संपत्ति के खिलाफ हिंसा व तोड़फोड़ के लिए प्रदर्शनों का फायदा उठा रहे हैं।"
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मंगलवार (स्थानीय समयानुसार) महासभा को संबोधित करते हुए भारतीय राजनयिक बर्खा तमराकर ने कहा कि भारत के संवैधानिक प्रावधान, जिनमें संविधान का अनुच्छेद 21 शामिल है, मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं और उचित प्रक्रिया सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मानवाधिकार को राजनीतिक दबाव या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
तमराकर ने कहा, "भारत असत्यापित आरोपों, अधूरे आंकड़ों या ऐसी रिपोर्ट, जिसमें भारत से जुड़ा कोई पर्यवेक्षण न हो, को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बारे में नकारात्मक छवि बनाने के किसी भी प्रयास का दृढ़ता से विरोध करता है... मानवाधिकार को राजनीतिक दबाव या चुनिंदा देश को निशाना बनाने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।" उन्होंने मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित जुड़ाव की आवश्यकता पर बल दिया।
भारतीय राजनयिक ने मानवाधिकार संबंधी चिंताओं के समाधान में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने असत्यापित आरोपों, अधूरे आंकड़ों या भारत-विशिष्ट अवलोकन रहित रिपोर्टों पर भरोसा करने के प्रति भी सावधान किया। भारत का कहना है कि मानवाधिकार संबंधी जुड़ाव निष्पक्षता, संवाद और सत्यापित जानकारी पर आधारित होना चाहिए, न कि चुनिंदा जांच या राजनीतिक विचारों पर।
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