राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति को लेकर मजबूत संदेश दिया है। मुंबई में आयोजित ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष – नए क्षितिज’ कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में लगभग 1.25 करोड़ हिंदू रहते हैं और यदि वे एकजुट हो जाएं, तो अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए राजनीतिक व्यवस्था का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं।
भागवत ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद छोड़ने के बाद बांग्लादेश में माहौल बदला है और भारत विरोधी भावनाएं भी बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि वहां के हिंदुओं ने इस बार देश छोड़कर भागने के बजाय डटकर रहने और संघर्ष करने का फैसला किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनके संघर्ष में एकता सबसे जरूरी है और जितनी जल्दी वे एकजुट होंगे, उतना बेहतर होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर के हिंदू अपनी सीमाओं के भीतर रहकर बांग्लादेश के हिंदुओं की हर संभव मदद करेंगे। इस दौरान भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ प्रमुख बनने के लिए किसी जाति की बाध्यता नहीं है। उन्होंने कहा कि संगठन में जिम्मेदारी व्यक्ति की योग्यता, समर्पण और कार्य क्षमता के आधार पर दी जाती है। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति का व्यक्ति भी संघ प्रमुख बन सकता है।
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भागवत ने कहा कि 75 वर्ष की आयु के बाद पद छोड़ने का नियम है और उन्होंने भी पद छोड़ने की इच्छा जताई थी, लेकिन साथियों के आग्रह पर अभी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आधिकारिक पद से हटने के बाद भी समाज के लिए काम जारी रहेगा।
मुस्लिम समुदाय के साथ संबंधों पर उन्होंने सामाजिक समरसता पर जोर दिया और कहा कि समाज में मतभेदों को बिना शत्रुता के सुलझाना चाहिए। धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपने ईश्वर को चुनने की स्वतंत्रता है, लेकिन जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
भागवत ने आरक्षण को संविधान के अनुरूप बताया और कहा कि समाज के कमजोर वर्गों को ऊपर उठाना सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर कहा कि यह ‘विन-विन’ होना चाहिए ताकि देश को नुकसान न हो।
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