भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा और लेफ्टिनेंट कर्नल पवित्रन राजन के एक शोधपत्र को नाटो की सह-वित्त पोषित अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में व्यापक रूप से उद्धृत किया गया है। पूर्व सेना प्रमुख और मिजोरम के राज्यपाल जनरल वीके सिंह ने इसे भारतीय रणनीतिक सोच की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।
‘बियॉन्ड द काइनेटिक: डीकंस्ट्रक्टिंग वॉरफेयर इन द सोशियो-टेक्निकल-कॉग्निटिव बैटलस्पेस’ शीर्षक वाला यह शोधपत्र नई दिल्ली स्थित काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस रिसर्च ने जनवरी में प्रकाशित किया था।
शोधपत्र में बताया गया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत और भौतिक लक्ष्यों को नष्ट करने तक सीमित नहीं है। सूचना, तकनीक और लोगों की सोच तथा धारणा भी संघर्ष का निर्णायक हिस्सा बन चुकी है। इसे सोशियो-टेक्निकल-कॉग्निटिव बैटलस्पेस की अवधारणा के जरिए समझाया गया है।
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लेखकों के अनुसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिदम द्वारा सार्वजनिक सूचनाओं को बढ़ावा दिए जाने से जनमत और रणनीतिक फैसले प्रभावित हो सकते हैं। सोशल मीडिया के जरिए विरोधी देश सामाजिक विभाजन और सूचना की कमी का फायदा उठाकर लोगों की सोच और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
शोधपत्र में चेतावनी दी गई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई दुष्प्रचार अभियानों को ज्यादा सटीक और बड़े पैमाने पर संचालित करने में मदद कर सकती है। व्यक्तिगत संदेशों के जरिए लोगों और समाज की कमजोरियों को निशाना बनाया जा सकता है।
इससे निपटने के लिए मीडिया साक्षरता बढ़ाने, संस्थानों को मजबूत करने, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और विदेशी नियंत्रण वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म की निगरानी बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।
नाटो से जुड़े अध्ययन ‘हाइब्रिड वॉर: थ्रेट्स टू पावर ग्रिड इन्फ्रास्ट्रक्चर’ के ‘एआई एंड कॉग्निटिव वॉरफेयर’ अध्याय में हुड्डा और राजन के शोध को कम से कम 10 बार उद्धृत किया गया है। इसमें ओओडीए लूप यानी ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट का भी विश्लेषण किया गया है।
अध्ययन में रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में स्टारलिंक जैसी निजी सैटेलाइट संचार सेवाओं और यूक्रेन द्वारा क्लियरव्यू एआई के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया है। शोध का निष्कर्ष है कि युद्ध में दुश्मन की सेना को हराए बिना भी उसकी सूचना व्यवस्था और जनता की धारणा को प्रभावित कर उसकी क्षमता कमजोर की जा सकती है।
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