राष्ट्रीय राजनीति में अब तक लगभग अज्ञात रही नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) अचानक सुर्खियों में आ गई है। इसकी वजह तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों द्वारा इस पार्टी में विलय की घोषणा है। इस घटनाक्रम ने एनसीपीआई को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है और साथ ही पार्टी के पुराने राजनीतिक रुख को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों के दौरान एनसीपीआई ने मतदाताओं से “अपने अधिकार बचाने के लिए दल-बदलुओं को ठुकराएं” का नारा दिया था। पार्टी के पोस्टरों में लिखा गया था, “अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दल-बदलुओं को अस्वीकार करें, राजनीतिक हस्तियों नहीं बल्कि समाजसेवियों का समर्थन करें।” उस समय पार्टी अपने चुनाव चिह्न ‘पेन निब’ (कलम की नोक) के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी।
एनसीपीआई ने त्रिपुरा की चावामानु, अंबासा, करमछड़ा और कैलाशहर विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि चुनाव में उसका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। कई सीटों पर उसके उम्मीदवार ‘नोटा’ (उपरोक्त में से कोई नहीं) विकल्प से भी पीछे रह गए, जबकि कुछ स्थानों पर उन्हें केवल मामूली संख्या में वोट मिले।
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अब वही पार्टी 20 बागी टीएमसी सांसदों को अपने साथ जोड़ने जा रही है, जिससे उसके पुराने राजनीतिक संदेश और वर्तमान रणनीति के बीच विरोधाभास की चर्चा तेज हो गई है।
एनसीपीआई भारतीय निर्वाचन आयोग में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। इसका मुख्य प्रभाव पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर त्रिपुरा में माना जाता है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार पार्टी मेघालय में भी अपना आधार बढ़ाने का प्रयास कर रही है। त्रिपुरा में इसे बंगाली भाषी मतदाताओं के बीच सीमित समर्थन मिलने की बात कही जाती है।
हालांकि पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बहुत कम रही है और इसके संस्थापक, शीर्ष नेतृत्व तथा संगठनात्मक ढांचे के बारे में सार्वजनिक रूप से अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। फिर भी टीएमसी के बागी सांसदों के प्रस्तावित विलय ने इसे अचानक राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
इस बीच, हावड़ा स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विलय एनसीपीआई की राजनीतिक स्थिति को कितना मजबूत कर पाता है
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