लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने के अभियान से जुड़े जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उनकी हिरासत के पीछे प्रशासन की दुर्भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि स्थानीय अधिकारियों ने जानबूझकर उनके उन सार्वजनिक वीडियो संदेशों और सोशल मीडिया पोस्ट को “छुपा लिया”, जिनमें उन्होंने हिंसा के बाद शांति बनाए रखने की अपील की थी।
सोनम वांगचुक की ओर से पेश वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि स्थानीय प्रशासन ने उनके शांति संदेशों को हिरासत आदेश जारी करने वाली प्राधिकरण तक नहीं पहुंचाया। यह गंभीर चूक दर्शाती है कि हिरासत का फैसला निष्पक्ष तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि दुर्भावनापूर्ण मंशा से लिया गया। वकील ने यह भी कहा कि हिरासत के पूरे कारणों को साझा करने में 28 दिनों की “स्पष्ट और गंभीर देरी” की गई, जो कानून का उल्लंघन है।
गौरतलब है कि लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई थी। इन घटनाओं के दो दिन बाद, 26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के तहत हिरासत में लिया गया। इसके बाद उन्हें राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।
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वांगचुक ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हिंसा के बाद उन्होंने लगातार शांति और संयम की अपील की थी, ताकि हालात और न बिगड़ें। इसके बावजूद उनके इन संदेशों को नजरअंदाज कर दिया गया और हिरासत को सही ठहराने के लिए उन्हें रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि यदि ये संदेश समय पर प्रस्तुत किए जाते, तो हिरासत की जरूरत ही नहीं पड़ती।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने हिरासत प्रक्रिया में हुई देरी और तथ्यों को छुपाने के आरोपों को गंभीरता से लिया। अब सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच कर रहा है कि क्या वांगचुक की हिरासत संवैधानिक प्रावधानों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप थी या नहीं।
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