सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जनवरी 2026) को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत “आतंकी कृत्य” की परिभाषा केवल हिंसा के अंतिम चरण तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें उस हिंसा तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया—साजिश रचना, तैयारी और उकसावा—भी शामिल है। यह टिप्पणी अदालत ने दिल्ली दंगों के ‘बड़ी साजिश’ मामले में आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में यूएपीए, 1967 की धारा 15(1)(a) का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि इस धारा में “by another means” यानी “किसी अन्य माध्यम से” जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि आतंकी कृत्य की परिधि व्यापक है। यह केवल बम, डायनामाइट, आग्नेयास्त्र या अन्य घातक हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं, बल्कि किसी भी ऐसे तरीके को शामिल करता है जो समाज में भय, असुरक्षा और अस्थिरता पैदा करे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित की जाती है, जिससे आर्थिक असुरक्षा उत्पन्न हो और नागरिक जीवन अस्थिर हो जाए, तो वह भी यूएपीए के तहत आतंकी कृत्य की श्रेणी में आ सकता है, भले ही उस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष हिंसा न हुई हो।
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अदालत ने रेखांकित किया कि आतंकी गतिविधियों का उद्देश्य केवल जान-माल का नुकसान नहीं होता, बल्कि सामाजिक व्यवस्था को पंगु बनाना, आम जनता में डर फैलाना और राज्य की स्थिरता को चुनौती देना भी होता है। इसलिए कानून की व्याख्या करते समय केवल अंतिम हिंसक घटना पर नहीं, बल्कि उससे पहले की पूरी साजिश और भूमिका पर भी ध्यान देना जरूरी है।
यह फैसला दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों के साथ-साथ यूएपीए के तहत चल रहे अन्य मामलों में भी एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है।
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