तेलंगाना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि आजीविका कमाने का अधिकार यात्रियों को खराब सेवा देने या उनके शोषण को उचित नहीं ठहरा सकता। अदालत ने रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान चलाने वाले एक कैटरर की याचिका खारिज करते हुए उसके लाइसेंस की समाप्ति को सही ठहराया।
यह याचिका काचेगुड़ा रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान संचालित करने वाले शेख खादर बाशा द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने अपनी विशेष लघु इकाई (स्पेशल माइनर यूनिट – SMU) लाइसेंस की समाप्ति को चुनौती देते हुए कहा था कि रेलवे कैटरिंग ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। बाशा ने तर्क दिया कि लाइसेंस रद्द किया जाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) — किसी भी पेशे या व्यापार को करने का अधिकार — और अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार — का उल्लंघन है।
8 जनवरी 2026 को दिए गए अपने फैसले में न्यायमूर्ति नागेश भीमपाका ने कहा कि सामाजिक न्याय और जीवनयापन का अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल यात्रियों से अधिक मूल्य वसूलने या सेवा मानकों के बार-बार उल्लंघन जैसी गतिविधियों को बचाने के लिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रथाएं न केवल यात्रियों को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि भारतीय रेलवे की छवि को भी धूमिल करती हैं।
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केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि वर्ष 2022 से 2025 के बीच याचिकाकर्ता को सेवा मानकों से विचलन के लिए छह बार दंडित किया गया था। इनमें ओवरचार्जिंग और गुणवत्ता संबंधी शिकायतें शामिल थीं। अदालत ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए कहा कि बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को केवल ‘रोज़गार के अधिकार’ के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने याचिका खारिज करते हुए रेलवे प्रशासन की कार्रवाई को वैध और जनहित में बताया।
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