पिछले दो दशकों से अधिक की उपग्रह निगरानी से यह सामने आया है कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पति आच्छादन में धीरे-धीरे गिरावट दर्ज की जा रही है। वैज्ञानिकों ने इसे जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों के कारण नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव का संकेत बताया है।
2001 से 2022 तक के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया कि हिमालयी वनस्पति अब भी मौसमी चक्रों के अनुसार व्यवहार करती है—मानसून के बाद हरियाली बढ़ती है और उससे पहले घटती है—लेकिन ये प्राकृतिक चक्र अब बाधित हो रहे हैं। अध्ययन में संकेत दिया गया है कि जंगलों, घास के मैदानों और घाटी क्षेत्रों पर बढ़ता तनाव जैव विविधता और जल संसाधनों के लिए खतरा बन सकता है।
पर्वतीय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं। बढ़ता तापमान, वर्षा के पैटर्न में बदलाव और प्रदूषण के स्तर में वृद्धि पारिस्थितिक जोखिमों को और गंभीर बना रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मामूली जलवायु परिवर्तन भी व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव डाल सकते हैं।
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यह अध्ययन नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिकों ने देश-विदेश के सहयोगियों के साथ मिलकर किया। शोध में गूगल अर्थ इंजन (GEE) जैसे वैश्विक मंच का उपयोग किया गया, जो बड़े पैमाने पर उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण में सक्षम है।
वनस्पति की स्थिति को मापने के लिए शोधकर्ताओं ने नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (NDVI) का उपयोग किया, जो पौधों के स्वास्थ्य और घनत्व का संकेतक है। कम NDVI मान बंजर सतहों जैसे चट्टान, बर्फ या खुली मिट्टी को दर्शाते हैं, जबकि उच्च मान घने हरित क्षेत्रों की ओर संकेत करते हैं। इसके साथ ही एन्हांस्ड वेजिटेशन इंडेक्स (EVI) और प्रमुख जलवायु कारकों का भी विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में मासिक, मौसमी और वार्षिक स्तर पर स्पष्ट बदलाव देखे गए। मानसून के बाद NDVI और EVI मान सबसे अधिक पाए गए, जबकि मानसून पूर्व ये न्यूनतम रहे। हालांकि, दो दशकों में राज्य के कई हिस्सों में वनस्पति स्वास्थ्य में गिरावट की चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है।
इस गिरावट के पीछे वनों की कटाई, कृषि विस्तार, अवैध लकड़ी कटान और शहरी-औद्योगिक प्रदूषण जैसे कारकों को जिम्मेदार ठहराया गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो जैव विविधता, भूजल पुनर्भरण, नदी तंत्र और समूचे हिमालयी पारिस्थितिक संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
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