भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट में एक साझा हलफनामा दाखिल करते हुए स्पष्ट किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को केवल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही पद से हटाया जा सकता है। यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और चुनाव आयुक्तों ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की ओर से संयुक्त रूप से दाखिल किया गया है।
हलफनामे में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज को किसी भी तरह से प्रतिबंधित करने का प्रयास मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के विपरीत होगा। आयोग ने अदालत के समक्ष इस बात पर जोर दिया कि संबंधित कानून के तहत सीईसी की पदावधि और हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सुरक्षा उपाय स्पष्ट रूप से तय किए गए हैं, जिनमें किसी तरह की ढील देना या बदलाव करना न्यायोचित नहीं होगा।
हलफनामे में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी स्पष्टीकरण दिया गया है। आयोग ने कहा कि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। यह स्पष्टीकरण उन आरोपों के संदर्भ में दिया गया प्रतीत होता है, जिनमें फॉर्म में बदलाव की बात कही गई थी।
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हलफनामे में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय से जुड़े एक घटनाक्रम का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने मतदाता सूची में किए गए कुछ समावेशनों (इंक्लूज़न्स) के खिलाफ अपीलें दायर की हैं। यह जानकारी मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं की निगरानी और उनमें पारदर्शिता बनाए रखने के आयोग के दावे को रेखांकित करने के लिए दी गई है।
यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के संदर्भ में दाखिल किया गया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया और पद से हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि संस्था की स्वायत्तता और उसके पदाधिकारियों की पदावधि से जुड़े मामलों में मौजूदा कानूनी ढांचे का पालन सख्ती से हो।
मामले में आगे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी रहने की उम्मीद है, जहां आयोग के इस रुख पर विचार किया जाएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार, चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की ओर से दाखिल इस हलफनामे को चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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