आज चेन्नई की सड़कों पर दोपहिया वाहन आम दिखाई देते हैं, लेकिन कभी ऐसा समय था जब साइकिल और मोटरसाइकिल शहर के लिए नई चीजें थीं। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, मद्रास में साइकिलों का आगमन संभवतः 1880 के दशक में हुआ। शुरुआती दौर में साइकिलों की संख्या सीमित थी, लेकिन जल्द ही लोगों में इनका आकर्षण बढ़ने लगा। यहां तक कि साइकिल चालकों के लिए अलग लेन बनाने की मांग भी उठने लगी थी।
साइकिलों के आने से पहले मद्रास में स्वदेशी दोपहिया साधन के रूप में रेक्का मौजूद थी। हालांकि, उसे चलाने के लिए किसी जानवर की जरूरत होती थी। इसके बाद पैडल से चलने वाली साइकिलों ने शहर की सड़कों पर अपनी जगह बनानी शुरू की।
4 मार्च 1899 में साइकिल चालकों को खतरनाक करतब नहीं करने की चेतावनी दी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि मुंबई में तीन साइकिल चालकों पर हैंडल से हाथ हटाकर साइकिल चलाने के लिए जुर्माना लगाया गया। इनमें से एक ने कहा कि वह पास के मंदिर में प्रार्थना करने के लिए हाथ उठाया था, जबकि दूसरे ने चेहरे से पसीना पोंछने की बात कही। तीसरे व्यक्ति ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। पहली गलती होने के कारण तीनों को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
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मद्रास में साइकिलों की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पम्मल संबंद मुदलियार के लेखन के अनुसार, साइकिल क्लब 1910 तक सुगुण विलास सभा की इमारत के भूतल पर संचालित होता था। इससे पता चलता है कि शहर में साइकिल चलाने वालों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी, खासकर अंग्रेजों के बीच।
मोटर चालित दोपहिया वाहनों का दौर
साइकिलों के बाद मोटर चालित दोपहिया वाहनों ने भी मद्रास की सड़कों पर दस्तक दी। इनकी आवाज और रफ्तार ने शहर की परिवहन संस्कृति में नया बदलाव ला दिया। रॉयल एनफील्ड जैसे प्रमुख ब्रांडों ने क्षेत्र में विनिर्माण इकाइयां स्थापित कीं।
धीरे-धीरे मोटरसाइकिल और स्कूटर शहर में आने-जाने के सबसे सुविधाजनक साधनों में शामिल हो गए। आज भी चेन्नई की व्यस्त सड़कों पर दोपहिया वाहन शहर के दैनिक जीवन का अहम हिस्सा हैं।
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