आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में पारंपरिक जलाशयों की घटती भंडारण क्षमता किसानों और ग्रामीणों के लिए बड़ी चिंता बनती जा रही है। जलाशयों में लगातार गाद जमा होने, पानी की आवक कम होने और जलग्रहण क्षेत्रों में बदलाव के कारण सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हुई है। कई जलाशयों के सिकुड़ने से किसानों को खेती के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है।
मई 2025 में अधिकारियों ने गुडिपाला मंडल के चार सिंचाई जलाशयों का निरीक्षण किया। इस दौरान किसानों और स्थानीय निवासियों ने जलाशयों की घटती क्षमता और कथित अतिक्रमण को लेकर अपनी चिंताएं अधिकारियों के सामने रखीं।
चित्तूर के जिला कलेक्टर सुमित कुमार ने किसानों और ग्रामीणों की शिकायतों के बाद बंगारप्पा चेरुवु, रेड्डम्मा चेरुवु, रामिरेड्डी चेरुवु और नारायणरेड्डी चेरुवु का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान जलाशयों की मौजूदा स्थिति, पानी की उपलब्धता और उनकी भंडारण क्षमता से जुड़े मुद्दों का जायजा लिया गया।
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स्थानीय लोगों के अनुसार, इन पारंपरिक जल स्रोतों में वर्षों से गाद जमा होती रही है। इसके कारण जलाशयों की गहराई और पानी संग्रह करने की क्षमता लगातार कम हुई है। इसके अलावा जलग्रहण क्षेत्रों में हुए बदलावों के कारण पहले की तुलना में जलाशयों में पानी की आवक भी प्रभावित हुई है।
जलाशयों की घटती क्षमता का सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है। चित्तूर जिले के कई किसान सिंचाई के लिए इन पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। पानी की उपलब्धता कम होने से किसानों को फसलों की सिंचाई में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जिला प्रशासन अब इन जलाशयों को पुनर्जीवित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है। जलाशयों से गाद हटाने, जल प्रवाह को बेहतर बनाने और कथित अतिक्रमण की स्थिति की जांच जैसे कदमों पर ध्यान दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक जलाशयों का पुनरुद्धार केवल सिंचाई व्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि भूजल स्तर सुधारने और ग्रामीण जल सुरक्षा मजबूत करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। समय रहते इन जल स्रोतों की क्षमता बहाल की जाती है तो किसानों को राहत मिलने के साथ क्षेत्र की जल व्यवस्था भी मजबूत हो सकती है।
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