पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राज्य में यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद करीब 60 लाख मतदाताओं के मामलों पर न्यायिक निर्णय अभी बाकी है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे को चुनावी अवसर के रूप में इस्तेमाल किया। पार्टी ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के दौरान आम लोगों को परेशान किया गया और इसके लिए भारत निर्वाचन आयोग तथा केंद्र की भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल भाजपा के कुछ नेता इस प्रक्रिया के परिणाम से निराश दिखाई दे रहे हैं। उनका मानना है कि मतदाता सूची से जितने नाम हटाए गए हैं, वह उनकी अपेक्षा से काफी कम हैं।
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आंकड़ों के अनुसार 27 अक्टूबर 2025 को जब यह पुनरीक्षण प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब पश्चिम बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ थी। लेकिन 28 फरवरी 2026 तक यह घटकर 7.04 करोड़ रह गई है। यानी इस दौरान मतदाता संख्या में करीब 8.09 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
हालांकि यह प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को निर्देश दिया था कि करीब 60 लाख मतदाताओं के मामलों की जांच न्यायिक अधिकारियों द्वारा की जाएगी। इसके लिए 501 न्यायिक अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी गई है। उनके फैसले के बाद कुछ और नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का यह संशोधन आने वाले चुनावों की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। राज्य में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच पहले से ही कड़ी राजनीतिक टक्कर है, ऐसे में मतदाता सूची को लेकर विवाद का असर चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता है।
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