भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अदालतों की सहायता कर सकती है, लेकिन न्यायाधीशों की जगह नहीं ले सकती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के सामने चुनौती यह है कि वह आधुनिक तकनीक को अपनाए, लेकिन साथ ही अपने संवैधानिक दायित्वों और न्याय के मूल सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह बात उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित एशियाई संवैधानिक न्यायालयों और समकक्ष संस्थानों के संघ (एएसीसीईआई) की 7वीं कांग्रेस को संबोधित करते हुए कही। इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका में तकनीक और एआई के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा की।
सीजेआई ने कहा कि तकनीकी प्रगति के दौर में अदालतें इससे अलग नहीं रह सकतीं। एआई का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने, बड़ी मात्रा में कानूनी सामग्री का विश्लेषण करने और न्यायिक कार्यों में सहायता देने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय देने की अंतिम जिम्मेदारी न्यायाधीशों की ही रहेगी।
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उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का काम केवल उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों का विश्लेषण करना नहीं है, बल्कि संविधान, कानून और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है। इसलिए तकनीक को अपनाते समय अदालतों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से समझौता नहीं करना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि एआई को न्यायिक सहायता के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि मानव न्यायाधीश के विकल्प के तौर पर। न्यायिक निर्णयों में मानवीय विवेक, संवैधानिक मूल्यों और परिस्थितियों की समझ महत्वपूर्ण होती है।
समरकंद में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एशिया के विभिन्न देशों की संवैधानिक अदालतों और समकक्ष संस्थानों से जुड़े प्रतिनिधियों ने न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया। सीजेआई का संबोधन तकनीक और न्याय व्यवस्था के बीच संतुलन पर केंद्रित रहा।
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