असम में कथित अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच निर्वासन की घटनाओं ने कई परिवारों को गहरे संकट और अनिश्चितता में डाल दिया है। कुछ परिवारों को जहां अपने परिजनों की कोई खबर तक नहीं मिल पा रही है, वहीं एक परिवार को आधी रात आई एक कॉल ही अपनी मां के सुरक्षित होने का इकलौता संकेत बन पाई।
करीब एक सप्ताह पहले अदिलुर ज़मान को यह जानकारी मिली थी कि उनकी मां आहिदा खातून को भारत छोड़ने का आदेश दिया गया है। इसके कुछ दिनों बाद, देर रात उनके व्हाट्सऐप पर एक अनजान नंबर से कॉल आई। कॉल करने वाली उनकी 46 वर्षीय मां थीं, जिन्होंने किसी और के फोन से उनसे संपर्क किया था। ज़मान के अनुसार, उनकी मां ने बताया कि उन्हें ठीक-ठीक नहीं पता कि वह कहां हैं, लेकिन वह “बांग्लादेश में ढाका के आसपास कहीं” मौजूद हैं।
यह घटना 19 दिसंबर को मटिया ट्रांजिट कैंप से 15 लोगों को “भारत-बांग्लादेश सीमा की ओर” ले जाए जाने के बाद सामने आई। असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने 1950 के एक कानून को फिर से लागू करते हुए त्वरित निर्वासन को कानूनी आधार बताया है। सरकार का दावा है कि यह प्रक्रिया कानून के तहत की जा रही है।
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हालांकि, कई परिवारों का कहना है कि उन्हें न तो कोई आधिकारिक सूचना दी गई और न ही यह बताया गया कि उनके परिजनों को कहां ले जाया गया है। कुछ लोगों को सिर्फ अफवाहों और अधूरी जानकारियों के सहारे जीना पड़ रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की मांग की है।
परिजनों का आरोप है कि अचानक की गई कार्रवाई, कानूनी सहायता की कमी और संचार के अभाव ने उनके संकट को और गहरा कर दिया है। एक परिवार के लिए आधी रात की कॉल राहत का क्षण बनी, लेकिन कई अन्य परिवार आज भी अपने प्रियजनों की कोई खबर मिलने की उम्मीद में अंधेरे में टटोल रहे हैं।
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