कारगिल युद्ध के वीर नायक और ‘लद्दाख के शेर’ के नाम से प्रसिद्ध सेवानिवृत्त कर्नल सोनम वांगचुक का 61 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उन्होंने लद्दाख स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन से सेना और पूरे देश में शोक की लहर है।
कर्नल सोनम वांगचुक 1999 के कारगिल युद्ध के शुरुआती नायकों में से एक थे और उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। उनका सैन्य जीवन लगभग तीन दशकों तक विभिन्न मोर्चों पर देश सेवा से भरा रहा।
1964 में लद्दाख के लेह में जन्मे सोनम वांगचुक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आधुनिक स्कूल, बाराखंभा रोड से प्राप्त की और दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज से इतिहास में स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से प्रशिक्षण लेकर भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त किया।
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उन्होंने असम रेजिमेंट की 4वीं बटालियन से अपने सैन्य करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद-रोधी अभियानों और श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (IPKF) मिशन में भी सेवा दी। बाद में वे लद्दाख स्काउट्स में शामिल हुए, जो भारतीय सेना की उच्च-ऊंचाई विशेषज्ञ इकाई है।
कारगिल युद्ध के दौरान 30–31 मई 1999 की रात उन्होंने बटालिक सेक्टर में चोरबत ला क्षेत्र को सुरक्षित करने का नेतृत्व किया। भारी गोलीबारी के बावजूद उन्होंने पीछे हटने के बजाय दुश्मन पर जवाबी हमला किया और रणनीतिक चोटियों पर नियंत्रण हासिल किया। उनके साहसिक कार्य को सेना ने “डेरिंग काउंटर-एम्बुश” बताया।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वे लद्दाख के गौरव थे और उनका जीवन साहस, बलिदान और राष्ट्र सेवा का प्रतीक है।
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