देशभर में इस वर्ष दुर्गा पूजा के मौके पर सजाए गए पंडालों ने लोगों का खासा ध्यान खींचा है। आयोजकों ने मंदिरों की वास्तुकला, हिंदू पौराणिक कथाओं और पारंपरिक कला से प्रेरणा लेकर अनेक रचनात्मक थीम तैयार की हैं। सिलीगुड़ी में अयोध्या के राम मंदिर की प्रतिकृति से लेकर वाराणसी में भगवान नरसिंह पर आधारित पंडाल तक, इस बार के आयोजनों में अलग-अलग शहरों में भिन्न-भिन्न झलक देखने को मिल रही है।
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में शक्तिगढ़ उज्ज्वल संघ द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा पंडाल ने अयोध्या के राम मंदिर की प्रतिकृति के ज़रिए श्रद्धालुओं और आगंतुकों का ध्यान आकर्षित किया है। लगभग 60 फीट ऊंचा यह भगवा रंग का ढांचा त्योहार के दौरान पंडाल देखने आने वाले लोगों के लिए एक बड़ा आकर्षण बन गया है। यह डिज़ाइन अयोध्या में बने राम मंदिर से प्रेरित है, जो अब वहां एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित हो चुका है।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में सिगरा इलाके के एक पंडाल ने भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नरसिंह से प्रेरणा ली है। इस थीम में भगवान नरसिंह द्वारा राक्षस राजा हिरण्यकशिपु के वध की कथा को दर्शाया गया है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में बुराई पर अच्छाई की जीत से जुड़ी एक प्रसिद्ध गाथा है।
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वहीं ओडिशा में प्रसिद्ध रेत कलाकार और पद्मश्री पुरस्कार विजेता सुदर्शन पटनायक ने पुरी बीच पर एक विशिष्ट कलाकृति के ज़रिए त्योहार को यादगार बनाया है। मां दुर्गा को समर्पित उनकी इस कलाकृति में 32 तरह के फल और सब्जियों का इस्तेमाल किया गया है, जिनमें 22 प्रकार की सब्जियां और 10 प्रकार के फल शामिल हैं। पटनायक ने प्राकृतिक उपज का उपयोग करते हुए एक ऐसी कलाकृति तैयार की है जो भक्ति और प्रकृति की सुंदरता के संदेश को एक साथ पिरोती है। कलाकार ने लोगों को यह सोचने के लिए भी प्रेरित किया है कि प्राकृतिक संसाधनों का रचनात्मक उपयोग किस तरह किया जा सकता है, जिससे यह कलाकृति केवल त्योहार की श्रद्धांजलि न रहकर एक व्यापक संदेश भी बन गई है।
दुर्गा पूजा हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से पश्चिम बंगाल सहित देश के कई हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार देवी दुर्गा द्वारा राक्षस महिषासुर पर विजय का प्रतीक है और बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है। इन उत्सवों के दौरान भव्य पंडाल, कलात्मक मूर्तियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक अनुष्ठान और भक्ति संगीत के माध्यम से समुदाय एक साथ जुड़ते हैं। महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी और विजयादशमी इस त्योहार के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में गिने जाते हैं। अनुष्ठान इन उत्सवों के केंद्र में रहते हैं, लेकिन पंडालों की थीम भी अब दुर्गा पूजा का अहम हिस्सा बन चुकी हैं, जहां आयोजक वास्तुकला, पौराणिक कथाओं और विभिन्न कला रूपों का इस्तेमाल कर ऐसे स्थान तैयार करते हैं जो लोगों को आकर्षित करते हैं।
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