उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) और उसके प्रमुख जयंत चौधरी की भूमिका चर्चा में है। 2022 में आरएलडी ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ चुनाव लड़ा था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वह बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल हो गई।
हाल के दिनों में जयंत चौधरी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच बयानबाजी भी तेज हुई है। अखिलेश ने अगस्त में जयंत का नाम लिए बिना कहा था कि उनकी पार्टी ने “चवन्नी को रुपया” बनाया, फिर भी सहयोगी उसे छोड़कर चले गए। जयंत ने इसके जवाब में कहा कि ऐसे राजनीतिक व्यवहार में अहंकार दिखाई देता है और इसका नुकसान हो सकता है।
पश्चिमी यूपी में आरएलडी की पारंपरिक राजनीतिक पकड़ जाट समुदाय से जुड़ी रही है। पार्टी अब अपने आधार का विस्तार करने के साथ जाट और गुर्जर समुदायों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। अगस्त में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, आरएलडी ने क्षेत्र में संगठन मजबूत करने और विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी की है।
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जयंत चौधरी की पार्टी ने सितंबर में सहारनपुर के रामपुर मनिहारान में ‘स्वाभिमान रैली’ भी आयोजित की। पार्टी की गतिविधियों को 2027 चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
2022 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा था और आठ सीटें जीती थीं। अब पार्टी एनडीए के भीतर अधिक सीटों की मांग कर सकती है, हालांकि सीट बंटवारे को लेकर अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं है।
आरएलडी के एनडीए में बने रहने की स्थिति में पश्चिमी यूपी में बीजेपी के साथ उसका गठबंधन और सपा के साथ उसके पुराने संबंध, दोनों ही राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहेंगे। हालिया रिपोर्टों में दोनों पक्षों के बीच वापसी की संभावना को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए हैं, जबकि आरएलडी नेताओं ने एनडीए के साथ बने रहने की बात कही है।
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