सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने गुरुवार को कहा कि सार्वजनिक संस्थानों को लोगों के सवालों और आलोचनाओं के लिए हमेशा खुला रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह संस्थानों की कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी ताकत का हिस्सा है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि आज के समय में लोग अपने अधिकारों और उन्हें संचालित करने वाले संस्थानों के बारे में पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक हैं। ऐसे में संस्थानों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम करें।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को सवाल पूछने का अधिकार है और संस्थानों को उन सवालों का सम्मानपूर्वक जवाब देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्वस्थ संवाद और आलोचनात्मक विचार किसी भी लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं।
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न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि संस्थानों में जवाबदेही की भावना बनी रहनी चाहिए, क्योंकि इससे लोगों का विश्वास कायम रहता है। उन्होंने कहा कि जब संस्थान जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं तो उनकी विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों बढ़ते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि बदलते समय के साथ नागरिकों की अपेक्षाएं भी बदल रही हैं। आज लोग सरकारी और संवैधानिक संस्थानों से अधिक पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रभावी कार्यप्रणाली की उम्मीद करते हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के अनुसार, सवालों को स्वीकार करना और उन पर विचार करना किसी भी मजबूत संस्थान की पहचान है। उन्होंने कहा कि संस्थानों को आलोचनाओं से सीखने और अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने की क्षमता रखनी चाहिए।
उन्होंने लोकतंत्र में संवाद की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जनता और संस्थानों के बीच विश्वास का संबंध तभी मजबूत हो सकता है, जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की बात सुनें।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में विभिन्न संस्थानों की भूमिका, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सार्वजनिक चर्चा लगातार बढ़ रही है।
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